1. ट्रेड डील का असर पहले ही “प्राइस-इन” हो चुका

  • भारत-अमेरिका ट्रेड डील से शुरुआती दिनों में शेयर बाजार और रुपये में मजबूती आई थी।
  • लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि यह उत्साह अल्पकालिक था और निवेशकों ने इसे पहले ही कीमतों में शामिल कर लिया था।

2. आरबीआई MPC बैठक की चिंता

  • 6 फरवरी 2026 को आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) का फैसला आने वाला है।
  • दिसंबर 2025 में पहले ही 125 बेसिस पॉइंट की दर कटौती हो चुकी है, जिससे रेपो रेट 5.25% पर आ गया है।
  • अब बाजार को उम्मीद है कि आरबीआई दरें स्थिर रखेगा और ध्यान तरलता प्रबंधन व मुद्रा स्थिरता पर देगा।

3. विदेशी निवेश प्रवाह की कमी

  • रुपये की कमजोरी का बड़ा कारण है FDI और FII प्रवाह की कमी
  • विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) ने हाल ही में भारतीय शेयरों में बिकवाली की है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया दबाव में आया।

4. महंगाई और वैश्विक जोखिम

  • फरवरी से नया महंगाई सूचकांक (base year series) लागू होगा, जिसमें महंगाई बढ़ने की संभावना है।
  • वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों और डॉलर इंडेक्स में उतार-चढ़ाव भी रुपये पर दबाव डाल रहे हैं।

निवेशकों का मूड

  • ट्रेड डील ने अल्पकालिक राहत दी, लेकिन स्थायी मजबूती के लिए स्थिर पूंजी प्रवाह और घरेलू आर्थिक संकेतक जरूरी हैं।
  • निवेशक अब आरबीआई के फैसले और उसके बाद आने वाले महंगाई आंकड़ों का इंतजार कर रहे हैं।

निष्कर्ष

रुपये की गिरावट यह दिखाती है कि सिर्फ ट्रेड डील से स्थायी मजबूती नहीं आती। असली दिशा आरबीआई की नीति, विदेशी निवेश प्रवाह और वैश्विक आर्थिक हालात तय करेंगे।

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