काठमांडू: नेपाल में 5 मार्च को होने वाले आम चुनाव से ठीक पहले राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ गया है। सितंबर 2025 में ‘जेन-जी’ (Gen Z) युवाओं के हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद, जिसने के.पी. शर्मा ओली की सरकार को उखाड़ फेंका था, अब पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह ने एक रहस्यमयी संदेश के जरिए चुनावी माहौल को गरमा दिया है। 1. पूर्व राजा का ‘ट्विस्ट’: चुनाव टालने का संकेत? लोकतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 78 वर्षीय पूर्व राजा ज्ञानेंद्र ने एक वीडियो संदेश जारी किया। भगवान पशुपतिनाथ का आह्वान करते हुए उन्होंने सवाल उठाया: बयान: “क्या देश के ज्वलंत संकटों को सुलझाए बिना चुनाव कराना सही है? बेहतर होगा कि पहले राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान हो और फिर मतदान।” मायने: उन्होंने नेपाल को ‘संकट के भंवर’ में फंसा हुआ बताया। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर चुनाव का बहिष्कार नहीं किया, लेकिन उनकी टाइमिंग ने नई बहस छेड़ दी है कि क्या वह फिर से राजशाही की वापसी का संकेत दे रहे हैं? The Himalayan Times 2. ‘रैपर’ बनाम ‘दिग्गज’: झापा में महामुकाबला काठमांडू के पूर्व मेयर और मशहूर रैपर बालेन शाह (35 वर्ष) अब नेपाल की राजनीति के नए पोस्टर बॉय बनकर उभरे हैं। सीधी चुनौती: बालेन शाह ने मेयर पद से इस्तीफा देकर पूर्व पीएम के.पी. शर्मा ओली के गृह क्षेत्र झापा-5 से चुनाव लड़ने का फैसला किया है। अंदाज: रॉकस्टार की तरह रैलियां करने वाले बालेन ‘घंटी’ (उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न) बजाकर भ्रष्टाचार और पुराने दलों के सिंडिकेट को खत्म करने की बात कर रहे हैं। ओली, जो कभी पूरे देश में रैलियां करते थे, अब अपनी ही सीट बचाने के लिए झापा तक सीमित हो गए हैं। The Kathmandu Post 3. सितंबर 2025 का वो विद्रोह जिसने नेपाल बदल दिया नेपाल में यह चुनाव ‘विशेष परिस्थितियों’ में हो रहे हैं। सितंबर 2025 में ओली सरकार द्वारा 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाने के बाद युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा था। हिंसा: प्रदर्शनकारियों ने संसद और सुप्रीम कोर्ट तक को आग लगा दी थी। इस संघर्ष में 70 से अधिक लोग मारे गए। नतीजा: भारी दबाव के बीच ओली को इस्तीफा देना पड़ा और सुशीला कार्की के नेतृत्व में एक अंतरिम प्रशासन ने कमान संभाली। 4. राजशाही की वापसी की सुगबुगाहट? नेपाल 2008 में धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बना था, लेकिन हालिया राजनीतिक अस्थिरता ने राजशाही समर्थकों को फिर से सक्रिय कर दिया है। समर्थन: भ्रष्टाचार और आर्थिक बदहाली से तंग आकर युवाओं का एक वर्ग अब राजा को ‘स्थिरता के प्रतीक’ के रूप में देख रहा है। बालेन का रुख: हालांकि बालेन शाह गणतंत्र के समर्थक रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक उनमें ‘राजशाही झुकाव’ (Pro-monarchist tendencies) देख रहे हैं। चुनाव के आंकड़े: कुल मतदाता: लगभग 1.90 करोड़। नए मतदाता: 8 लाख (पहली बार वोट देने वाले)। सीटें: 165 संसदीय निर्वाचन क्षेत्र। निष्कर्ष: 5 मार्च का चुनाव केवल एक सरकार चुनने के लिए नहीं, बल्कि यह तय करने के लिए होगा कि नेपाल अपने पुराने दिग्गजों (ओली, देउबा) के साथ रहेगा या बालेन शाह जैसे युवाओं और पूर्व राजा के प्रभाव में एक नया रास्ता चुनेगा। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation IDFC First Bank में ₹590 करोड़ का बड़ा घोटाला: हरियाणा सरकार के खाते से गायब हुए पैसे, बैंक के शेयरों में भारी गिरावट दिल्ली का ‘OG’ मॉल अब बना ‘घोस्ट टाउन’: अंसल प्लाजा की चमक फीकी, सन्नाटे में डूबा दक्षिण दिल्ली का यह लैंडमार्क