नई दिल्ली: फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की 17 फरवरी से शुरू हो रही भारत यात्रा के दौरान रक्षा जगत का अब तक का सबसे बड़ा सौदा होने जा रहा है। 114 राफेल लड़ाकू विमानों का यह सौदा न केवल वायुसेना की गिरती ताकत को संभालेगा, बल्कि भारत के रक्षा उद्योग को भी नई दिशा देगा। 1. वायुसेना की ‘संजीवनी’: भारतीय वायुसेना फिलहाल विमानों की भारी कमी से जूझ रही है। स्वीकृत 42 स्क्वाड्रन की तुलना में भारत के पास केवल 29 स्क्वाड्रन बचे हैं, जबकि चीन (60+ स्क्वाड्रन) और पाकिस्तान (25 स्क्वाड्रन) अपनी ताकत लगातार बढ़ा रहे हैं। यह सौदा इस गैप को भरने के लिए बेहद जरूरी है। 2. निजी क्षेत्र में पहली फाइटर जेट प्रोडक्शन लाइन: इस सौदे की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि अब केवल सरकारी कंपनी HAL ही विमान नहीं बनाएगी। टाटा (TASL) और डसाल्ट: 114 में से 96 विमान भारत में ही असेंबल किए जाएंगे। इनके पंख और बॉडी का हिस्सा टाटा एडवांस सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) द्वारा बनाए जाने की संभावना है। प्राइवेट सेक्टर की एंट्री: नागपुर में डसाल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड (DRAL) में इनका निर्माण होने की उम्मीद है, जिससे रक्षा क्षेत्र में सरकारी एकाधिकार खत्म होगा। 3. ‘मारुति 800’ जैसा बदलाव (The Maruti Moment): विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे 1980 के दशक में मारुति-सुजुकी के आने से भारत का ऑटोमोबाइल सेक्टर बदल गया था, वैसे ही राफेल का यह सौदा भारत में एयरोस्पेस इकोसिस्टम तैयार करेगा। इसमें 50% स्वदेशी सामग्री का लक्ष्य रखा गया है, जो स्थानीय सप्लायर्स और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देगा। 4. विमानों की विविधता होगी कम: वर्तमान में वायुसेना 6 अलग-अलग तरह के विमान (सुखोई, राफेल, तेजस, मिराज, मिग-29, जगुआर) उड़ाती है, जिससे उनके रखरखाव और ट्रेनिंग में काफी मुश्किल आती है। राफेल के आने से वायुसेना अपने बेड़े को स्टैंडर्डाइज (मानकीकृत) कर पाएगी। 2030 के दशक तक मिराज, मिग-29 और जगुआर रिटायर हो जाएंगे और वायुसेना मुख्य रूप से सुखोई-30MKI, राफेल और स्वदेशी तेजस पर टिकी होगी। 5. फ्रांस: भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार: अमेरिका जैसे देशों के विपरीत, फ्रांस के साथ भारत के रक्षा संबंधों में ‘एंड-यूज मॉनिटरिंग’ जैसी शर्तें नहीं होतीं। भारत और फ्रांस मिलकर 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (AMCA) के लिए शक्तिशाली इंजन भी विकसित करेंगे। सौदे की चुनौतियां:आलोचकों का कहना है कि यह सौदा इतना महंगा है कि इससे भारत के अपने स्वदेशी कार्यक्रमों (जैसे AMCA और TEDBF) के बजट पर असर पड़ सकता है। चुनौती यह है कि विदेशी तकनीक का उपयोग केवल अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाए, न कि पूरी तरह उन पर निर्भर होने के लिए। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation ग्रेटर नोएडा में दर्दनाक हादसा: बारिश से भरे गड्ढे में डूबने से 3 साल के मासूम की मौत “सिर्फ इसलिए कि यह इंस्टाग्राम पर है, इसका मतलब यह नहीं कि यह आपके लिए सही है”: शेफ संजीव कपूर