सुप्रीम कोर्ट ने जाति जनगणना पर जनहित याचिका खारिज की

नई दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट ने साल 2027 में प्रस्तावित जाति जनगणना की योजना और प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इस जनगणना पर लगभग 13,500 करोड़ रुपये का खर्च आएगा और इसके आंकड़ों का उपयोग आने वाले कई दशकों तक सामाजिक कल्याण नीतियों में किया जाएगा।

कोर्ट की टिप्पणी

  • सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि जनगणना का कार्य प्रशिक्षित विशेषज्ञों और इस क्षेत्र के अनुभवी अधिकारियों पर छोड़ देना चाहिए
  • उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत इस तरह की प्रशासनिक और नीतिगत प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करेगी।
  • जनगणना एक व्यापक और तकनीकी कवायद है, जिसे केवल विशेषज्ञ ही सही ढंग से अंजाम दे सकते हैं।

याचिकाकर्ता की दलील

  • याचिकाकर्ता ने कहा कि इतनी बड़ी लागत जनता के पैसे की बर्बादी है।
  • उनका तर्क था कि जाति आधारित आंकड़े समाज में विभाजन को और गहरा कर सकते हैं।
  • उन्होंने यह भी कहा कि इन आंकड़ों का उपयोग आने वाले 40 वर्षों तक नीतियों में किया जाएगा, जिससे असमानता बढ़ सकती है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि जनगणना का काम विशेषज्ञों और प्रशासनिक तंत्र का विषय है, और अदालत इसमें दखल नहीं देगी। इस फैसले से यह संकेत मिलता है कि 2027 की जाति जनगणना की तैयारी अब सरकार और संबंधित एजेंसियों के हाथ में ही रहेगी।

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