नई दिल्ली | 17 फरवरी, 2026 | एजुकेशन डेस्क

“नमस्कार, आप देख रहे हैं एजुकेशन वॉच। आज से देशभर में सीबीएसई की बोर्ड परीक्षाएं शुरू हो गई हैं। 43 लाख से ज्यादा छात्र परीक्षा केंद्रों पर पहुंचे हैं, लेकिन इस बार उनके हाथ में सिर्फ पेन और एडमिट कार्ड नहीं, बल्कि उलझी हुई नीतियों का एक पुलिंदा भी है। सीबीएसई ने दावा किया था कि ‘दो-परीक्षा नीति’ से छात्रों का तनाव कम होगा, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। आइए समझते हैं कि आखिर छात्र और पेरेंट्स इस साल इतने परेशान क्यों हैं।”

न्यूज़ हेडलाइन्स (Main Highlights)

  • दो परीक्षाओं का चक्र: 2026 से लागू नई नीति के तहत छात्र साल में दो बार बोर्ड परीक्षा दे सकते हैं, लेकिन पहली परीक्षा (फरवरी) देना अनिवार्य है।
  • 120 दिनों का तनाव: विशेषज्ञों का कहना है कि पहले बोर्ड का तनाव 30 दिनों का होता था, जो अब मई-जून की दूसरी परीक्षा के कारण 120 दिनों के ‘सब्सक्रिप्शन मॉडल’ में बदल गया है।
  • नियमों का जाल: “फर्स्ट चांस इम्प्रूवमेंट”, “एसेंशियल रिपीट” और “कंपार्टमेंट” जैसे भारी-भरकम शब्दों ने 15-16 साल के बच्चों को उलझा दिया है।
  • डिजिटल मूल्यांकन: कक्षा 12 के लिए इस बार ‘ऑन-स्क्रीन डिजिटल इवैल्यूएशन’ शुरू किया गया है, जिसे लेकर शिक्षकों और स्कूलों में ट्रेनिंग की कमी की बात सामने आ रही है।

ग्राउंड रिपोर्ट: “हम पॉलिसी के लैब रैट (Lab Rats) बन गए हैं”

[रिपोर्टर वॉयसओवर]
परीक्षा केंद्रों के बाहर खड़े अभिभावकों का कहना है कि उन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा सीबीएसई के सर्कुलर (Circulars) पढ़ने में समय बिताना पड़ रहा है।

छात्रों और अभिभावकों की प्रमुख चिंताएं:

  1. रणनीति की कमी: दिल्ली की एक अभिभावक रितिका मेहरा ने बताया, “स्कूल कह रहे हैं कि पहली परीक्षा मत छोड़ो, कोचिंग वाले कह रहे हैं दूसरी परीक्षा के लिए ऊर्जा बचाओ। समझ नहीं आता कि सही क्या है।”
  2. मानसिक थकान: एक छात्र ने भावुक होकर कहा, “हर साल सीबीएसई हमारे ऊपर नए प्रयोग करता है। कभी सीसीई, कभी कॉम्पिटेंसी बेस्ड सवाल और अब ये दो परीक्षाएं। हमें लग रहा है जैसे हम किसी पायलट प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं।”
  3. पॉलिसी बनाम पढ़ाई: बोर्ड ने ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ का वादा किया था, लेकिन प्रशासनिक जटिलता इतनी बढ़ गई है कि इसे समझना किसी ‘इनकम टैक्स पॉलिसी’ को समझने जैसा कठिन हो गया है।

विशेषज्ञों की राय

एजुकेशन पॉलिसी एनालिस्ट अनिल अग्रवाल का मानना है कि सीबीएसई की मंशा आधुनिक है, लेकिन क्रियान्वयन (Execution) बहुत जटिल है। एक साथ एग्जाम पैटर्न, इवैल्यूएशन और एटेम्पट स्ट्रक्चर बदलने से ‘रिफॉर्म ओवरलोड’ की स्थिति पैदा हो गई है।


निष्कर्ष

सीबीएसई का ‘इम्प्रूवमेंट’ मॉडल सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन क्या यह वास्तव में छात्रों का बोझ कम कर रहा है या इसे और बढ़ा रहा है? आज जब छात्र हॉल में बैठकर गणित और बिजनेस स्टडीज के सवाल हल कर रहे हैं, बाहर उनके माता-पिता सीबीएसई की ‘नीतिगत परीक्षा’ दे रहे हैं।

[एंकर साइन-ऑफ]
“उम्मीद है कि आने वाले समय में बोर्ड इन नियमों में स्पष्टता लाएगा ताकि छात्र केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे सकें। न्यूज़ डेस्क से मैं [AI सहायक], कैमरामैन के साथ।”


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