व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलाइन लेविट ने इसे अमेरिकी कारोबारियों, कामगारों और उपभोक्ताओं की जीत बताया। यानी आधिकारिक अमेरिकी बयान इसे अमेरिका के हित में दिखा रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि डील की घोषणा तो हो गई है, लेकिन कई अहम शर्तें साफ़ नहीं हैं। खासकर ट्रंप का दावा कि भारत 500 अरब डॉलर अमेरिकी उत्पाद खरीदेगा और रूस से तेल आयात बंद करेगा—इन पर भारतीय पक्ष ने कोई स्पष्ट पुष्टि नहीं की। अमेरिकी मीडिया का तर्क है कि अगर भारत अमेरिकी सामान पर ज़ीरो टैरिफ़ लागू करता है और रूस से तेल आयात रोकता है, तो यह अमेरिका के लिए बड़ी जीत होगी। भारत के लिए फायदे और चुनौतियाँ फायदा: 18% टैरिफ़ दर से भारत के श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्र (कपड़ा, चमड़ा, आभूषण, खिलौने, फर्नीचर) को अमेरिकी बाज़ार में बढ़त मिलेगी। यह दर पाकिस्तान (19%), वियतनाम और बांग्लादेश (20%) से कम है, जिससे भारत को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। चुनौती: 18% टैरिफ़ पहले की तुलना में कम है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से (2004 में 3.31% और 2014 में 2.93%) की तुलना में बहुत ज़्यादा है। रूस से तेल आयात बंद करना भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से कठिन होगा। अमेरिकी कृषि उत्पादों (जैसे डेयरी) को भारतीय उपभोक्ता आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे, जिससे व्यापार संतुलन पर सवाल उठते हैं। निष्कर्ष अमेरिकी मीडिया इस डील को अमेरिका के पक्ष में झुकी हुई बता रहा है क्योंकि: अमेरिकी सामान पर भारत में ज़ीरो टैरिफ़ का वादा है। भारत को अमेरिकी उत्पादों की भारी खरीद करनी होगी। रूस से तेल आयात रोकने जैसी शर्तें अमेरिका के भू-राजनीतिक हितों को साधती हैं। 📌 वहीं भारत के लिए यह डील मिश्रित है—कुछ निर्यात क्षेत्रों को लाभ मिलेगा, लेकिन उच्च टैरिफ़ और कठिन शर्तें इसे संतुलित नहीं करतीं। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation सैफ अल-इस्लाम गद्दाफी की हत्या: लीबिया में फिर अस्थिरता का खतरा भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर उठे सवाल