भारत और अमेरिका के बीच हुए हालिया व्यापार समझौते में एक प्रमुख बिंदु भारत द्वारा रूस से तेल खरीद कम कर अमेरिका और वेनेजुएला से अधिक तेल खरीदना माना जा रहा है। लेकिन व्यापारिक आंकड़े एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं।

आंकड़ों का गणित:

  • रूस का दबदबा: वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने रूस से 87.54 मिलियन टन कच्चे तेल का आयात किया। यह 2022-23 की तुलना में 72.1% की भारी बढ़ोतरी है।
  • अमेरिका और वेनेजुएला की स्थिति: उसी अवधि में अमेरिका से आयात केवल 10.55 मिलियन टन (जो कि 30% घटा है) और वेनेजुएला से केवल 2.98 मिलियन टन रहा।
  • बड़ा अंतर: अमेरिका और वेनेजुएला का संयुक्त आयात (13.53 मिलियन टन) रूस से होने वाले आयात की तुलना में 74.01 मिलियन टन कम है।

क्या विकल्प संभव है?

  • मेक्सिको का उदाहरण: यदि अमेरिका मेक्सिको को होने वाला अपना सारा निर्यात (26.50 मिलियन टन) भारत की ओर मोड़ दे, तब भी कुल क्षमता केवल 40.03 मिलियन टन ही होगी, जो रूस की तुलना में फिर भी 47 मिलियन टन कम रह जाएगी।
  • समय का अनुमान: यदि अमेरिका से तेल आयात 32% की वार्षिक दर से बढ़ता है, तो रूस के मौजूदा स्तर तक पहुँचने में 4.5 से 5 साल लगेंगे। वेनेजुएला को इस स्तर तक पहुँचने में 6 साल से अधिक लगेंगे।
  • औसत समय: दोनों देशों के संयुक्त आयात को रूस के बराबर पहुँचने में लगभग 5.5 साल का समय लगेगा, जो वर्तमान वैश्विक अनिश्चितता को देखते हुए नामुमकिन सा लगता है।

निष्कर्ष:

सैद्धांतिक रूप से रूसी तेल को बदलना आकर्षक लग सकता है, लेकिन व्यापारिक वास्तविकता इससे कोसों दूर है। वेनेजुएला के आंतरिक राजनीतिक संकट और अमेरिका की सीमित निर्यात क्षमता के कारण, निकट भविष्य में रूस का विकल्प ढूंढना संरचनात्मक रूप से अव्यवहार्य है। भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए तेल की किफायती दर और निरंतर आपूर्ति सबसे महत्वपूर्ण है।

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