• नारद मुनि की परीक्षा: उन्होंने पार्वती जी को यह समझाने की कोशिश की कि शिवजी कठिन तपस्वी हैं, उनका मार्ग कठिन है।
  • सप्तर्षियों की रोक: उन्होंने भी पार्वती जी को समझाया कि यह मार्ग आसान नहीं है, लेकिन पार्वती जी का संकल्प अडिग रहा।
  • पार्वती जी का तप: उन्होंने कठोर तपस्या की, कठिनाइयों को सहा, और अंततः शिवजी को पति रूप में प्राप्त किया।

इस कथा का सार यही है कि सच्चा प्रेम केवल आकर्षण नहीं होता, बल्कि धैर्य, त्याग और अटल विश्वास से सिद्ध होता है। पार्वती जी का प्रेम आदर्श है जिसमें दृढ़ निश्चय और समर्पण की शक्ति दिखाई देती है।

अजब ही सुंदर संयोग है. फरवरी का महीना है. मौसम में ताजगी है, नयापन है, उत्साह है. दिल में उमंग है और तरंगें उठ रही हैं. किन असल सवाल ये है कि प्रेम आपको कितना समझ में आता है. या आज की पीढ़ी इसे किस तरह से देखती है? इस सवाल का जवाब वक्त देता है और बड़े मौके से देता है.

महाशिवरात्रिः महादेव और माता पार्वती के मिलन का दिन
महाशिवरात्रि को महादेव और देवी पार्वती की मैरिज एनीवर्सरी के तौर पर देखा जाता है, यह प्रेम कहानी किसी राजकुमार और राजकुमारी की नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन की कथा है. जब राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर सती ने देह त्याग दी, तब तब शिव विरक्त होकर समाधि में लीन हो गए. संसार असंतुलित हो गया. देवताओं पर तारकासुर का अत्याचार बढ़ा. वरदान था कि उसका वध केवल शिव-पुत्र ही कर सकता है इधर सती जो खुद में पराशक्ति थी, वह जो चाहती थी वह कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने भी खुद को कर्मफल के अधीन रखा. शिवजी को फिर से अपने पति के रूप में पाने लिए सती ने हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया. यह प्रसंग शिव पुराण की रुद्र संहिता में विस्तार से आता है. स्कंद पुराण भी इसका जिक्र करता हैहिमालय के घर में एक पुत्री का जन्म हुआ है. वह पुत्री आदिशक्ति ही है. एक दिन देवर्षि नारद हिमालय से मिलने आए. तब राजा-रानी ने अपनी पुत्री पार्वती के भविष्य के बारे में उनसा पूछा. देवर्षि नारद ने पहले तो पार्वती के सभी शुभ लक्षणों का जिक्र किया. फिर अचानक कह उठे कि इसके जीवन में एक ही दोष है कि कि इसका विवाह किसी गुणहीन, धनहीन, विरक्त, बिना मान वाला और माता-पिता विहीन लापरवाह व्यक्ति से ही होगा.

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