12 फरवरी को हुए बांग्लादेश के आम चुनावों में जमात-ए-इस्लामी को लेकर लगाए जा रहे कयास गलत साबित हुए हैं। चुनाव से पहले माना जा रहा था कि जमात अपनी स्थापना के बाद से अब तक का सबसे मजबूत प्रदर्शन करेगी, लेकिन नतीजों ने कहानी बदल दी है। मुख्य बातें: उम्मीदों के उलट नतीजे: चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी की उम्मीद कर रही थी। लेकिन शुरुआती रुझानों और नतीजों में तारिक रहमान की BNP ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। अमेरिका ने भी तारिक रहमान को इस जीत के लिए बधाई दी है। जमात का असंतोष: चुनावी नतीजों के बाद जमात ने चुनाव की अखंडता और प्रक्रिया पर “गंभीर सवाल” उठाए हैं। पार्टी ने एक बयान में कहा है कि वे चुनाव परिणामों की प्रक्रिया से संतुष्ट नहीं हैं। क्यों पिछड़ गई जमात? युवा और महिला वोटर्स: आंदोलन का नेतृत्व करने वाले ‘जेन-जी’ (Gen Z) युवाओं और महिला मतदाताओं ने जमात के बजाय BNP को चुना। अल्पसंख्यक और अवामी समर्थक: हिंदू अल्पसंख्यकों और अवामी लीग के बचे हुए समर्थकों ने भी जमात के कट्टरपंथी रुख को देखते हुए अपना समर्थन BNP को दिया। अमेरिका के साथ ‘गुप्त समझौता’ का आरोप: चुनाव के दौरान द वॉशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट ने खलबली मचा दी थी, जिसमें दावा किया गया था कि अमेरिकी राजनयिक जमात के साथ संपर्क बढ़ा रहे हैं। BNP ने आरोप लगाया था कि जमात ने अमेरिका के साथ “गुप्त समझौता” किया है, जो देश की संप्रभुता के लिए खतरा हो सकता है। शुरुआती बढ़त का नुकसान: शेख हसीना के हटने के बाद जुलाई 2024 के विद्रोह में जमात काफी सक्रिय थी, लेकिन जैसे ही तारिक रहमान ने चुनावी मैदान में कदम रखा, जमात की शुरुआती बढ़त खत्म हो गई। निष्कर्ष: बांग्लादेश की राजनीति अब एक नए युग में प्रवेश कर रही है जहाँ तारिक रहमान प्रधानमंत्री बनने की तैयारी में हैं। जमात, जो कभी सत्ता के केंद्र में आने का सपना देख रही थी, अब चुनावी नतीजों पर सवाल उठाकर अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation अमेरिकी नक्शे पर मचा बवाल: भारत के पक्ष में नक्शा देख बौखलाया पाकिस्तान, वॉशिंगटन में ‘डैमेज कंट्रोल’ की कोशिश क्या बांग्लादेश बनेगा दक्षिण एशिया का नया ‘पावर प्लेयर’?