भारत के नजरिए से इस राजनीतिक बदलाव के सकारात्मक पहलुओं को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:

  • लोकतांत्रिक स्थिरता: भारत लंबे समय से बांग्लादेश में एक स्थिर और निर्वाचित सरकार का पक्षधर रहा है। 2024 के तख्तापलट और अंतरिम सरकार के दौर के बाद, तारिक रहमान की वापसी और चुनाव में भारी जनादेश अराजकता के डर को खत्म करता है और संवैधानिक व्यवस्था को मजबूती देता है।
  • चरमपंथ पर लगाम (जमात-ए-इस्लामी का हाशिए पर रहना): चुनावों में कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी को बहुमत न मिलना भारत के लिए सुरक्षा के लिहाज से बड़ी राहत है। तारिक रहमान ने खुद को एक उदार विकल्प के रूप में पेश किया है, जिससे भारत विरोधी चरमपंथी गतिविधियों के कम होने की उम्मीद है।
  • आर्थिक सहयोग और कनेक्टिविटी: रहमान ने “अर्थव्यवस्था आधारित विदेश नीति” और “बांग्लादेश फर्स्ट” का नारा दिया है। भारत इसे द्विपक्षीय व्यापार, ऊर्जा सहयोग और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाओं (जैसे बिजली व्यापार और सड़क नेटवर्क) को आगे बढ़ाने के एक सुनहरे अवसर के रूप में देख रहा है।
  • रणनीतिक संतुलन (चीन-पाकिस्तान फैक्टर): विशेषज्ञ मानते हैं कि तारिक रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश अपनी विदेश नीति में संतुलन बनाने की कोशिश करेगा। भारत इसे चीन और पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने और “नेबरहुड फर्स्ट” नीति के तहत रिश्तों को फिर से मजबूत करने के मौके के रूप में देख रहा है।
  • अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का भरोसा: तारिक रहमान ने अपने संबोधन में सांप्रदायिक सद्भाव और शांति का वादा किया है। भारत के लिए बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एक संवेदनशील मुद्दा रहा है, और नई सरकार से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की अपेक्षा की जा रही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में स्पष्ट किया कि भारत, बांग्लादेश के साथ अपने बहुआयामी संबंधों को मजबूत करने और साझा विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए नई सरकार के साथ काम करने को उत्सुक है।

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