भारत और यूरोपीय संघ ने 20 साल के इंतजार के बाद एक “ऐतिहासिक” व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और उनके द्वारा भारतीय सामानों पर लगाए गए 50% टैरिफ ने इस समझौते को तेजी से पूरा करने में मदद की है। मुख्य बिंदु: ट्रंप के टैरिफ का जवाब: यह समझौता ऐसे समय में आया है जब ट्रंप ने भारत पर भारी टैरिफ लगाए हैं। इसके जरिए भारत ने यह संदेश दिया है कि वह व्यापार के लिए केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है। वहीं, यूरोप भी अमेरिका और चीन पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। ग्लोबल पावरहाउस: यह संधि दुनिया की 25% अर्थव्यवस्था और एक-तिहाई वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करती है। पीएम मोदी के अनुसार, यह वैश्विक व्यवस्था में स्थिरता लाने का काम करेगी। ट्रंप टीम की नाराजगी: अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेेंट ने इस डील की आलोचना करते हुए कहा है कि इसके जरिए यूरोप परोक्ष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध को फंडिंग कर रहा है। उनका तर्क है कि यूरोप, भारत में रिफाइन किए गए रूसी तेल को खरीदकर उन प्रतिबंधों को दरकिनार कर रहा है जिन्हें अमेरिका लागू करने की कोशिश कर रहा है। कनाडा का समर्थन: कनाडा के ऊर्जा मंत्री टिम हॉजसन ने ट्रंप पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए कहा कि यह समझौता उन “वैश्विक वर्चस्ववादियों” (hegemons) को करारा जवाब है जो टैरिफ का इस्तेमाल दबाव बनाने के औजार के रूप में करते हैं। अमेरिकी राजनीति में हलचल: सीनेटर टेड क्रूज़ का एक ऑडियो भी सामने आया है जिसमें उन्होंने भारत के साथ व्यापारिक समझौता न करने के लिए अपनी ही सरकार (ट्रंप और जेडी वेंस) की आलोचना की है। निष्कर्ष: यह समझौता दिखाता है कि भारत अब वैश्विक व्यापार में एक स्वतंत्र धुरी के रूप में उभर रहा है। जहाँ एक तरफ अमेरिका टैरिफ के जरिए दबाव बना रहा है, वहीं भारत ने यूरोप के साथ हाथ मिलाया है, जो ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती साबित हो सकता है। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation “भारत की निकल पड़ी”: ट्रंप के सलाहकार ने कहा- ‘यूरोप के साथ डील में दिल्ली का पलड़ा भारी’ यूरोपीय परिषद के प्रमुख एंटोनियो कोस्टा ने दिखाया अपना OCI कार्ड; बोले- “मेरे लिए यह समझौता व्यक्तिगत है”