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हिमंत बिस्वा सरमा वीडियो विवाद: बीजेपी ने पोस्ट क्यों हटाई और इसके राजनीतिक मायने क्या हैं?असम बीजेपी के एक्स हैंडल पर पोस्ट किए गए एक वीडियो को विवाद खड़ा होने के बाद हटा लिया गया है. इस वीडियो में राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को एक राइफ़ल संभालते हुए दिखाया गया था. वीडियो में एआई से तैयार किया गया पार्ट जोड़ा गया था, जिनमें दाढ़ी और सफ़ेद टोपी पहने पुरुषों की तस्वीरों पर गोलियाँ लगती हुई दिखाई गईं. यह वीडियो 7 फ़रवरी को असम बीजेपी हैंडल पर पोस्ट किया गया था और आलोचना बढ़ने के बाद इसे 8 फ़रवरी को हटा दिया गया.वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली. विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई यूज़र्स ने इसे भड़काऊ और ख़तरनाक बताया. आलोचकों का कहना है कि वीडियो एक समुदाय को निशाना बनाता है और इससे समाज में तनाव बढ़ सकता है. इस वीडियो में “फ़ॉरेनर फ़्री असम” और “नो मर्सी” जैसे वाक्य भी स्क्रीन पर दिखाए गए थे.वीडियो में एक तस्वीर में दो लोगों को दिखाया गया था, जिनमें से एक की पहचान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के रूप में की जा रही थी. दोनों को सफ़ेद टोपी पहने हुए दिखाया गया था. क़रीब 17 सेकंड के इस वीडियो के अंत में मुख्यमंत्री को काउबॉय अंदाज़ में दिखाया गया था. इस दृश्य में वह राइफ़ल और काउबॉय हैट के साथ दिखाई देते हैं. वीडियो में कुछ संदेश भी दिखाई दिए जिनका अर्थ था, “तुम पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए?” और “बांग्लादेशियों के लिए कोई माफ़ी नहीं है.” यह वीडियो ऐसे समय में साझा किया गया जब असम में बंगाली मूल के मुसलमानों को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी पहले से तेज़ हो गई है.हिमंत बिस्वा सरमा ने क्या कहाइस विवाद के बीच मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने वीडियो नहीं देखा था. उन्होंने कहा कि वह हर सोशल मीडिया पोस्ट को व्यक्तिगत रूप से नहीं देखते और कई बार पार्टी के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म अलग टीम संभालती है. हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि वह ‘मियां’ मुसलमानों के ख़िलाफ़ बोलते रहते हैं. इस बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उन्होंने असम के सीएम के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए शिकायत दर्ज कराई है. इस पर न्यूज़ एजेंसी एएनआई से बातचीत में सरमा ने कहा, ”मैं जेल जाने के लिए तैयार हूं, मैं क्या कर सकता हूं? मुझे किसी भी वीडियो के बारे में कुछ नहीं पता. अगर उन्होंने मेरे ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया है तो मुझे गिरफ़्तार कर लीजिए. मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन मैं अपने शब्दों पर कायम हूं. मैं बांग्लादेशी घुसपैठियों के ख़िलाफ़ हूं और आगे भी उनके ख़िलाफ़ रहूंगा.” छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें पॉडकास्ट: कहानी ज़िंदगी की कहानी ज़िंदगी की मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. एपिसोड समाप्त इस वीडियो पर कांग्रेस ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, “बीजेपी के असम प्रदेश के आधिकारिक हैंडल ने एक वीडियो पोस्ट किया, जो अल्पसंख्यकों की ‘पॉइंट-ब्लैंक’ हत्या को महिमामंडित करता हुआ दिखाई देता है. यह बेहद घृणित और परेशान करने वाला है और इसे किसी सामान्य ट्रोल सामग्री के तौर पर खारिज नहीं किया जा सकता. यह बड़े पैमाने पर हिंसा और नरसंहार के लिए उकसाने जैसा है.” वहीं कांग्रेस नेता और वकील अमन वदूद ने इस वीडियो को लेकर बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा, “वीडियो बिल्कुल साफ़ तौर पर बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काने की कोशिश है. यह नरसंहार जैसी सोच को बढ़ावा देने वाला है.” उन्होंने कहा, “वीडियो का संदेश इतना भद्दा और स्पष्ट था कि हर जगह इसकी आलोचना हो रही थी. सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया तक में बीजेपी पर हमला हो रहा था. लगभग हर कोई अदालतों और संस्थाओं से पूछ रहा था कि इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है.” अमन वदूद ने कहा, “असम में बीजेपी पूरी तरह भटक चुकी है. विकास के उनके दावे काम नहीं कर रहे हैं. बीजेपी नहीं चाहती कि लोग इन मुद्दों पर बात करें. अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए ‘मियां’ समुदाय पर लगातार हमला किया जा रहा है.” जबकि तृणमूल कांग्रेस ने कहा, “कल्पना कीजिए, एक निर्वाचित मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के वीडियो में मुसलमानों पर पॉइंट-ब्लैंक गोली चलाने का अभिनय कर रहे हों, जो इतना आपत्तिजनक था कि तीखी प्रतिक्रिया के बाद उसे हटाना पड़ा.” टीएमसी ने इसे ‘राज्य समर्थित कट्टरपंथीकरण’ बताया है.वरिष्ठ पत्रकार अफ़रीदा हुसैन का कहना है कि इस तरह का वीडियो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है. वह कहती हैं, “जब मैंने पहली बार यह वीडियो देखा तो मेरे मन में बेहद नकारात्मक भाव आए. यह उस तरह का वीडियो नहीं है जिसकी उम्मीद किसी सत्तारूढ़ दल या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से की जाती है. किसी समुदाय की ओर राइफ़ल ताने हुए दिखाना स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत नहीं है. यह सार्वजनिक विमर्श में हिंसा को सामान्य बनाने जैसा है. वे ख़ून-ख़राबे की मानसिकता को बढ़ावा नहीं दे सकते.” उन्होंने कहा, “वे गौरव को सफ़ेद टोपी में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. अब वे कह रहे हैं कि इसका मक़सद घुसपैठियों को दिखाना था, लेकिन कोई संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसे वीडियो कैसे पोस्ट कर सकता है?” अफ़रीदा हुसैन का कहना है कि वीडियो हटाना पर्याप्त नहीं है. वह कहती हैं, “लाखों लोगों तक यह वीडियो पहले ही पहुंच चुका है. नफ़रत पहले ही फैल चुकी है. अगर आगे चलकर कोई हिंसा होती है तो उसकी ज़िम्मेदारी से बचना मुश्किल होगा.” विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब असम में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. राज्य में पहचान, नागरिकता और प्रवासन से जुड़े मुद्दे लंबे समय से चुनावी विमर्श का हिस्सा रहे हैं. राज्य की राजनीति पर नजऱ रखने वालों का कहना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर बनाई गई सामग्री चुनावी ध्रुवीकरण को तेज़ कर सकती है. गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर अखिल रंजन दत्ता का कहना है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में ध्रुवीकरण की रणनीति तेज़ हुई है. वह कहते हैं, “सरकार तुष्टिकरण की राजनीति करने के बावजूद अपनी लोकप्रियता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखती. मुझे लगता है कि असुरक्षा की भावना ने सरकार को ध्रुवीकरण की राजनीति की ओर धकेला है.” असम में ‘मियां’ शब्द आम तौर पर बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यह समुदाय लंबे समय से पहचान और नागरिकता से जुड़े विवादों के केंद्र में रहा है. बीजेपी और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा लंबे समय से ‘मियां’ मुसलमानों को लेकर सख़्त रुख़ अपनाते रहे हैं. उनके बयानों में अक्सर घुसपैठ और बंगाली मूल के मुसलमानों का मुद्दा प्रमुख रूप से उठाया जाता रहा है. विवाद ने ‘मियां’ समुदाय को लेकर सरमा की पहले की टिप्पणियों पर भी दोबारा ध्यान खींचा है. इससे पहले एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सरमा ने कहा था कि उनका काम “मियां लोगों को परेशान करना” है और उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि अगर रिक्शा चालक मियां मुसलमान हो तो उसे तय किराए से कम पैसे दिए जाएँ. उन्होंने कहा था, “जो भी किसी भी तरह से परेशानी दे सकता है, वह दे, आप भी दें. रिक्शा में अगर किराया 5 रुपये है तो उन्हें 4 रुपये दें. तभी वे परेशान होंगे और असम छोड़ देंगे.” प्रोफ़ेसर अखिल रंजन का कहना है कि मुसलमानों को लेकर राजनीतिक संदेशों में लगातार बदलाव देखने को मिला है. यह चुनावों से पहले हिमंत के घबराए होने का संकेत माना जा रहा है. वह कहते हैं, “कभी सभी मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है, कभी बांग्लादेशी मुसलमानों और स्थानीय ‘मियां’ मुसलमानों के बीच अंतर किया जाता है और कभी सभी ‘मियां’ लोगों को बाहर करने की बात कही जाती है. इससे स्थानीय लोगों के बीच नागरिक अधिकारों को लेकर भ्रम पैदा किया जा रहा है. यह एक राजनीतिक रणनीति है.” विशेषज्ञों का मानना है कि वीडियो हटाने का फ़ैसला केवल सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके क़ानूनी और राजनीतिक असर को लेकर भी चिंताएं थीं. अखिल रंजन कहते हैं, “इस तरह के वीडियो गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकती हैं. किसी कम्युनिटी की ओर राइफ़ल ताने हुए दिखना बयान देने से कहीं ज़्यादा गंभीर माना जा सकता है. इसे क़ानूनी तौर पर भी चुनौती मिल सकती थी.” विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीतिक रणनीति को समझे बिना इस विवाद को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता. अखिल रंजन कहते हैं, “वह दो तरह की राजनीतिक छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं. एक तरफ़ वह ख़ुद को कट्टर हिंदुत्ववादी नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं और दूसरी तरफ़ स्थानीय और स्वदेशी समुदायों के हितों के रक्षक के तौर पर पेश करना चाहते हैं. वह हिंदुत्व और स्थानीय पहचान को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.” अफ़रीदा हुसैन का मानना है कि यह रणनीति पार्टी के भीतर अपनी राजनीतिक भूमिका मज़बूत करने की कोशिश का हिस्सा भी हो सकती है. वह कहती हैं, “वह पार्टी में ख़ुद को एक अहम और मज़बूत नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. उनकी राजनीति उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा आक्रामक और ध्रुवीकरण करने वाले नेताओं की श्रेणी में ला रही है.” विधानसभा चुनाव से पहले पहचान और घुसपैठ से जुड़े मुद्दों के बार-बार सामने आने की संभावना है. हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि इस तरह की रणनीति का चुनावी असर कितना होगा, यह स्पष्ट नहीं है. अफ़रीदा हुसैन कहती हैं, “हर बार चुनावी ध्रुवीकरण से राजनीतिक फ़ायदा मिलेगा, यह तय नहीं है. लेकिन इस तरह की बयानबाज़ी समाज में विभाजन को ज़रूर गहरा कर सकती है.” वह यह भी कहती हैं कि इस तरह की रणनीति का चुनाव पर क्या असर होगा, इसके बारे में कुछ भी सटीक तौर पर नहीं कहा जा सकता. वहीं, अखिल रंजन कहते हैं, “यह कहना मुश्किल है कि इससे चुनाव में कितना फ़ायदा होगा, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में सरकार की घबराहट और असुरक्षा की झलक दिखाई देती है.”

यह विवाद असम की राजनीति और चुनावी रणनीति के लिहाज़ से बहुत अहम है।

बीजेपी ने वीडियो क्यों हटाया

  • तीखी आलोचना और कानूनी खतरा: वीडियो को भड़काऊ और समुदाय विशेष को निशाना बनाने वाला बताया गया। विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे हिंसा भड़काने की कोशिश कहा। इससे कानूनी कार्रवाई की आशंका बढ़ गई।
  • सोशल मीडिया दबाव: पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया हुई। इसे “नरसंहार जैसी सोच” को बढ़ावा देने वाला बताया गया।
  • राजनीतिक नुकसान का डर: चुनाव से पहले ऐसा वीडियो पार्टी की छवि को नुकसान पहुँचा सकता था। इसलिए इसे हटाना पार्टी के लिए नुकसान-नियंत्रण (damage control) का कदम था।

राजनीतिक मायने

  • ध्रुवीकरण की रणनीति: असम में पहचान, नागरिकता और प्रवासन लंबे समय से चुनावी मुद्दे रहे हैं। इस वीडियो को ध्रुवीकरण बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
  • ‘मियां’ मुसलमानों पर फोकस: मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पहले से ही इस समुदाय को लेकर सख़्त बयान देते रहे हैं। वीडियो उसी राजनीतिक रुख़ का विस्तार था।
  • लोकप्रियता और असुरक्षा: विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार अपनी लोकप्रियता को लेकर आश्वस्त नहीं है। असुरक्षा की भावना उन्हें और आक्रामक ध्रुवीकरण की ओर धकेल रही है।
  • राष्ट्रीय राजनीति में छवि निर्माण: सरमा की रणनीति केवल राज्य तक सीमित नहीं है। वह खुद को कट्टर हिंदुत्ववादी नेता और स्थानीय हितों के रक्षक दोनों रूपों में पेश करना चाहते हैं। इससे उनकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका मज़बूत हो सकती है।
  • चुनावी असर अनिश्चित: ध्रुवीकरण से हर बार राजनीतिक फ़ायदा मिलेगा, यह तय नहीं है। लेकिन इससे समाज में विभाजन गहरा हो सकता है और चुनावी विमर्श विकास जैसे मुद्दों से हटकर पहचान और घुसपैठ पर केंद्रित हो सकता है।

संक्षेप में, वीडियो हटाना बीजेपी का रक्षात्मक कदम था, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश साफ़ है—असम में चुनावी राजनीति पहचान और ध्रुवीकरण पर ही टिकी रहेगी।

आप चाहें तो मैं इस विवाद के संभावित चुनावी असर पर अलग-अलग परिदृश्यों (जैसे ध्रुवीकरण सफल हो या उल्टा असर पड़े) का विश्लेषण भी कर सकता हूँ। क्या आप चाहते हैं कि मैं वह परिदृश्य विश्लेषण करूँ?

हिमंत बिस्वा सरमा वीडियो विवाद: बीजेपी ने पोस्ट क्यों हटाई और इसके राजनीतिक मायने क्या हैं?असम बीजेपी के एक्स हैंडल पर पोस्ट किए गए एक वीडियो को विवाद खड़ा होने के बाद हटा लिया गया है. इस वीडियो में राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को एक राइफ़ल संभालते हुए दिखाया गया था. वीडियो में एआई से तैयार किया गया पार्ट जोड़ा गया था, जिनमें दाढ़ी और सफ़ेद टोपी पहने पुरुषों की तस्वीरों पर गोलियाँ लगती हुई दिखाई गईं. यह वीडियो 7 फ़रवरी को असम बीजेपी हैंडल पर पोस्ट किया गया था और आलोचना बढ़ने के बाद इसे 8 फ़रवरी को हटा दिया गया.वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली. विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई यूज़र्स ने इसे भड़काऊ और ख़तरनाक बताया. आलोचकों का कहना है कि वीडियो एक समुदाय को निशाना बनाता है और इससे समाज में तनाव बढ़ सकता है. इस वीडियो में “फ़ॉरेनर फ़्री असम” और “नो मर्सी” जैसे वाक्य भी स्क्रीन पर दिखाए गए थे.वीडियो में एक तस्वीर में दो लोगों को दिखाया गया था, जिनमें से एक की पहचान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई के रूप में की जा रही थी. दोनों को सफ़ेद टोपी पहने हुए दिखाया गया था. क़रीब 17 सेकंड के इस वीडियो के अंत में मुख्यमंत्री को काउबॉय अंदाज़ में दिखाया गया था. इस दृश्य में वह राइफ़ल और काउबॉय हैट के साथ दिखाई देते हैं. वीडियो में कुछ संदेश भी दिखाई दिए जिनका अर्थ था, “तुम पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए?” और “बांग्लादेशियों के लिए कोई माफ़ी नहीं है.” यह वीडियो ऐसे समय में साझा किया गया जब असम में बंगाली मूल के मुसलमानों को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी पहले से तेज़ हो गई है.हिमंत बिस्वा सरमा ने क्या कहाइस विवाद के बीच मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने वीडियो नहीं देखा था. उन्होंने कहा कि वह हर सोशल मीडिया पोस्ट को व्यक्तिगत रूप से नहीं देखते और कई बार पार्टी के डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म अलग टीम संभालती है. हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि वह ‘मियां’ मुसलमानों के ख़िलाफ़ बोलते रहते हैं. इस बीच एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि उन्होंने असम के सीएम के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए शिकायत दर्ज कराई है. इस पर न्यूज़ एजेंसी एएनआई से बातचीत में सरमा ने कहा, ”मैं जेल जाने के लिए तैयार हूं, मैं क्या कर सकता हूं? मुझे किसी भी वीडियो के बारे में कुछ नहीं पता. अगर उन्होंने मेरे ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया है तो मुझे गिरफ़्तार कर लीजिए. मुझे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन मैं अपने शब्दों पर कायम हूं. मैं बांग्लादेशी घुसपैठियों के ख़िलाफ़ हूं और आगे भी उनके ख़िलाफ़ रहूंगा.” छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें पॉडकास्ट: कहानी ज़िंदगी की कहानी ज़िंदगी की मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. एपिसोड समाप्त इस वीडियो पर कांग्रेस ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, “बीजेपी के असम प्रदेश के आधिकारिक हैंडल ने एक वीडियो पोस्ट किया, जो अल्पसंख्यकों की ‘पॉइंट-ब्लैंक’ हत्या को महिमामंडित करता हुआ दिखाई देता है. यह बेहद घृणित और परेशान करने वाला है और इसे किसी सामान्य ट्रोल सामग्री के तौर पर खारिज नहीं किया जा सकता. यह बड़े पैमाने पर हिंसा और नरसंहार के लिए उकसाने जैसा है.” वहीं कांग्रेस नेता और वकील अमन वदूद ने इस वीडियो को लेकर बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा, “वीडियो बिल्कुल साफ़ तौर पर बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काने की कोशिश है. यह नरसंहार जैसी सोच को बढ़ावा देने वाला है.” उन्होंने कहा, “वीडियो का संदेश इतना भद्दा और स्पष्ट था कि हर जगह इसकी आलोचना हो रही थी. सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के मीडिया तक में बीजेपी पर हमला हो रहा था. लगभग हर कोई अदालतों और संस्थाओं से पूछ रहा था कि इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है.” अमन वदूद ने कहा, “असम में बीजेपी पूरी तरह भटक चुकी है. विकास के उनके दावे काम नहीं कर रहे हैं. बीजेपी नहीं चाहती कि लोग इन मुद्दों पर बात करें. अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए ‘मियां’ समुदाय पर लगातार हमला किया जा रहा है.” जबकि तृणमूल कांग्रेस ने कहा, “कल्पना कीजिए, एक निर्वाचित मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के वीडियो में मुसलमानों पर पॉइंट-ब्लैंक गोली चलाने का अभिनय कर रहे हों, जो इतना आपत्तिजनक था कि तीखी प्रतिक्रिया के बाद उसे हटाना पड़ा.” टीएमसी ने इसे ‘राज्य समर्थित कट्टरपंथीकरण’ बताया है.वरिष्ठ पत्रकार अफ़रीदा हुसैन का कहना है कि इस तरह का वीडियो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है. वह कहती हैं, “जब मैंने पहली बार यह वीडियो देखा तो मेरे मन में बेहद नकारात्मक भाव आए. यह उस तरह का वीडियो नहीं है जिसकी उम्मीद किसी सत्तारूढ़ दल या संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से की जाती है. किसी समुदाय की ओर राइफ़ल ताने हुए दिखाना स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत नहीं है. यह सार्वजनिक विमर्श में हिंसा को सामान्य बनाने जैसा है. वे ख़ून-ख़राबे की मानसिकता को बढ़ावा नहीं दे सकते.” उन्होंने कहा, “वे गौरव को सफ़ेद टोपी में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. अब वे कह रहे हैं कि इसका मक़सद घुसपैठियों को दिखाना था, लेकिन कोई संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसे वीडियो कैसे पोस्ट कर सकता है?” अफ़रीदा हुसैन का कहना है कि वीडियो हटाना पर्याप्त नहीं है. वह कहती हैं, “लाखों लोगों तक यह वीडियो पहले ही पहुंच चुका है. नफ़रत पहले ही फैल चुकी है. अगर आगे चलकर कोई हिंसा होती है तो उसकी ज़िम्मेदारी से बचना मुश्किल होगा.” विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब असम में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. राज्य में पहचान, नागरिकता और प्रवासन से जुड़े मुद्दे लंबे समय से चुनावी विमर्श का हिस्सा रहे हैं. राज्य की राजनीति पर नजऱ रखने वालों का कहना है कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर बनाई गई सामग्री चुनावी ध्रुवीकरण को तेज़ कर सकती है. गुवाहाटी यूनिवर्सिटी के राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर अखिल रंजन दत्ता का कहना है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में ध्रुवीकरण की रणनीति तेज़ हुई है. वह कहते हैं, “सरकार तुष्टिकरण की राजनीति करने के बावजूद अपनी लोकप्रियता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखती. मुझे लगता है कि असुरक्षा की भावना ने सरकार को ध्रुवीकरण की राजनीति की ओर धकेला है.” असम में ‘मियां’ शब्द आम तौर पर बंगाली मूल के मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. यह समुदाय लंबे समय से पहचान और नागरिकता से जुड़े विवादों के केंद्र में रहा है. बीजेपी और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा लंबे समय से ‘मियां’ मुसलमानों को लेकर सख़्त रुख़ अपनाते रहे हैं. उनके बयानों में अक्सर घुसपैठ और बंगाली मूल के मुसलमानों का मुद्दा प्रमुख रूप से उठाया जाता रहा है. विवाद ने ‘मियां’ समुदाय को लेकर सरमा की पहले की टिप्पणियों पर भी दोबारा ध्यान खींचा है. इससे पहले एक सार्वजनिक कार्यक्रम में सरमा ने कहा था कि उनका काम “मियां लोगों को परेशान करना” है और उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि अगर रिक्शा चालक मियां मुसलमान हो तो उसे तय किराए से कम पैसे दिए जाएँ. उन्होंने कहा था, “जो भी किसी भी तरह से परेशानी दे सकता है, वह दे, आप भी दें. रिक्शा में अगर किराया 5 रुपये है तो उन्हें 4 रुपये दें. तभी वे परेशान होंगे और असम छोड़ देंगे.” प्रोफ़ेसर अखिल रंजन का कहना है कि मुसलमानों को लेकर राजनीतिक संदेशों में लगातार बदलाव देखने को मिला है. यह चुनावों से पहले हिमंत के घबराए होने का संकेत माना जा रहा है. वह कहते हैं, “कभी सभी मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है, कभी बांग्लादेशी मुसलमानों और स्थानीय ‘मियां’ मुसलमानों के बीच अंतर किया जाता है और कभी सभी ‘मियां’ लोगों को बाहर करने की बात कही जाती है. इससे स्थानीय लोगों के बीच नागरिक अधिकारों को लेकर भ्रम पैदा किया जा रहा है. यह एक राजनीतिक रणनीति है.” विशेषज्ञों का मानना है कि वीडियो हटाने का फ़ैसला केवल सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके क़ानूनी और राजनीतिक असर को लेकर भी चिंताएं थीं. अखिल रंजन कहते हैं, “इस तरह के वीडियो गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकती हैं. किसी कम्युनिटी की ओर राइफ़ल ताने हुए दिखना बयान देने से कहीं ज़्यादा गंभीर माना जा सकता है. इसे क़ानूनी तौर पर भी चुनौती मिल सकती थी.” विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीतिक रणनीति को समझे बिना इस विवाद को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता. अखिल रंजन कहते हैं, “वह दो तरह की राजनीतिक छवि बनाने की कोशिश कर रहे हैं. एक तरफ़ वह ख़ुद को कट्टर हिंदुत्ववादी नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं और दूसरी तरफ़ स्थानीय और स्वदेशी समुदायों के हितों के रक्षक के तौर पर पेश करना चाहते हैं. वह हिंदुत्व और स्थानीय पहचान को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.” अफ़रीदा हुसैन का मानना है कि यह रणनीति पार्टी के भीतर अपनी राजनीतिक भूमिका मज़बूत करने की कोशिश का हिस्सा भी हो सकती है. वह कहती हैं, “वह पार्टी में ख़ुद को एक अहम और मज़बूत नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. उनकी राजनीति उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर ज़्यादा आक्रामक और ध्रुवीकरण करने वाले नेताओं की श्रेणी में ला रही है.” विधानसभा चुनाव से पहले पहचान और घुसपैठ से जुड़े मुद्दों के बार-बार सामने आने की संभावना है. हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि इस तरह की रणनीति का चुनावी असर कितना होगा, यह स्पष्ट नहीं है. अफ़रीदा हुसैन कहती हैं, “हर बार चुनावी ध्रुवीकरण से राजनीतिक फ़ायदा मिलेगा, यह तय नहीं है. लेकिन इस तरह की बयानबाज़ी समाज में विभाजन को ज़रूर गहरा कर सकती है.” वह यह भी कहती हैं कि इस तरह की रणनीति का चुनाव पर क्या असर होगा, इसके बारे में कुछ भी सटीक तौर पर नहीं कहा जा सकता. वहीं, अखिल रंजन कहते हैं, “यह कहना मुश्किल है कि इससे चुनाव में कितना फ़ायदा होगा, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में सरकार की घबराहट और असुरक्षा की झलक दिखाई देती है.” ise news form me bana do

हिमंत बिस्वा सरमा वीडियो विवाद: राजनीतिक मायने

पृष्ठभूमि 7 फरवरी को असम बीजेपी के आधिकारिक X हैंडल पर एक वीडियो पोस्ट किया गया जिसमें मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को राइफ़ल संभालते हुए दिखाया गया। वीडियो में एआई से तैयार किए गए दृश्य थे, जिनमें दाढ़ी और सफ़ेद टोपी पहने पुरुषों पर गोलियाँ चलती दिखाई गईं। इसमें “फ़ॉरेनर फ़्री असम” और “नो मर्सी” जैसे संदेश भी थे।

विवाद और आलोचना

  • विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई यूज़र्स ने इसे भड़काऊ और ख़तरनाक बताया।
  • कांग्रेस ने इसे “अल्पसंख्यकों की पॉइंट-ब्लैंक हत्या का महिमामंडन” कहा और नरसंहार जैसी सोच को बढ़ावा देने वाला बताया।
  • टीएमसी ने इसे “राज्य समर्थित कट्टरपंथीकरण” कहा।
  • वरिष्ठ पत्रकार अफ़रीदा हुसैन ने इसे लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बताया और कहा कि वीडियो हटाना पर्याप्त नहीं है क्योंकि नफ़रत पहले ही फैल चुकी है।

बीजेपी ने पोस्ट क्यों हटाई

  • सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया और आलोचना।
  • कानूनी कार्रवाई की आशंका, क्योंकि वीडियो को हिंसा भड़काने वाला माना गया।
  • चुनावी नुकसान से बचने के लिए “डैमेज कंट्रोल”।

राजनीतिक मायने

  • ध्रुवीकरण की रणनीति: असम की राजनीति लंबे समय से पहचान, नागरिकता और प्रवासन के मुद्दों पर टिकी रही है। यह वीडियो चुनावी ध्रुवीकरण को तेज़ करने की कोशिश माना जा रहा है।
  • ‘मियां’ मुसलमानों पर फोकस: सरमा पहले से ही इस समुदाय पर सख़्त बयान देते रहे हैं। वीडियो उसी रुख़ का विस्तार था।
  • लोकप्रियता और असुरक्षा: विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार अपनी लोकप्रियता को लेकर आश्वस्त नहीं है, इसलिए ध्रुवीकरण की ओर झुकाव बढ़ा है।
  • राष्ट्रीय राजनीति में छवि निर्माण: सरमा खुद को कट्टर हिंदुत्ववादी नेता और स्थानीय हितों के रक्षक दोनों रूपों में पेश करना चाहते हैं।
  • चुनावी असर अनिश्चित: ध्रुवीकरण से हर बार राजनीतिक फ़ायदा मिलेगा, यह तय नहीं है। लेकिन इससे समाज में विभाजन गहरा हो सकता है।

निष्कर्ष वीडियो हटाना बीजेपी का रक्षात्मक कदम था, लेकिन विवाद ने यह साफ़ कर दिया कि असम की राजनीति में चुनावी विमर्श पहचान और घुसपैठ जैसे संवेदनशील मुद्दों पर ही केंद्रित रहेगा।

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पीसीबी और आईसीसी की बैठक में ऐसा क्या हुआ कि पाकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ मैच के बायकॉट का फ़ैसला बदला?पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने पाकिस्तानी क्रिकेट टीम को 15 फ़रवरी को भारत के ख़िलाफ़ टी20 वर्ल्ड कप मैच खेलने की अनुमति दे दी है और कहा है कि यह फ़ैसला मित्र देशों के अनुरोध पर लिया गया है. एक फ़रवरी को पाकिस्तान ने घोषणा की थी कि उसकी क्रिकेट टीम टी-20 वर्ल्ड कप में 15 फ़रवरी को भारत के ख़िलाफ़ होने वाले मैच का बहिष्कार करेगी. लेकिन 10 दिनों बाद ही पाकिस्तान ने ये फ़ैसला बदल दिया. पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड यानी पीसीबी के अध्यक्ष मोहसिन नकवी ने शहबाज़ शरीफ़ को पीसीबी, अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के प्रतिनिधियों और बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक के फ़ैसले के बारे में औपचारिक रूप से जानकारी दी. बीबीसी उर्दू के मुताबिक सरकार के बयान में कहा गया है कि पाकिस्तान सरकार ने बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड द्वारा पीसीबी को किए गए औपचारिक अनुरोधों के साथ-साथ श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य सदस्य देशों से मिले संदेशों के आधार पर ये फ़ैसला किया है. बयान के अनुसार, प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने सोमवार शाम को श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके से फोन पर बात की.इस दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि “पाकिस्तान और श्रीलंका हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं, खासकर मुश्किल समय में. श्रीलंका के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री से मौजूदा गतिरोध को सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करने पर गंभीरता से विचार करने का अनुरोध किया.” सरकार के बयान के अनुसार, “मित्र देशों के अनुरोध को ध्यान में रखते हुए, पाकिस्तान सरकार ने पाकिस्तानी टीम को आईसीसी पुरुष टी20 वर्ल्ड कप के निर्धारित मैच के लिए 15 फरवरी, 2026 को मैदान में उतरने का निर्देश दिया है.” बयान में आगे कहा गया है, “यह निर्णय क्रिकेट की भावना बनाए रखने और सभी प्रतिभागी देशों में इस वैश्विक खेल की निरंतरता को सुनिश्चित करने के मकसद से लिया गया है.”उल्लेखनीय है कि विवाद तब शुरू हुआ जब बांग्लादेश ने अपनी टीम की सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए उसके मैच भारत से बाहर कराने का अनुरोध किया. हालांकि, आईसीसी ने उनके अनुरोध को खारिज कर दिया था. तब बांग्लादेश की जगह स्कॉटलैंड को टी-20 वर्ल्ड कप में शामिल किया गया. इसके बाद पाकिस्तानी सरकार ने घोषणा की कि उनकी टीम 15 फरवरी को भारत के ख़िलाफ़ होने वाले मैच का बहिष्कार करेगी. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने बाद में कहा कि यह निर्णय बांग्लादेश के समर्थन में लिया गया था.आईसीसी ने क्या कहा?अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट समिति (आईसीसी) ने भी एक्स पर पोस्ट कर इस बात की पुष्टि की. आईसीसी ने लिखा, “पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) और आईसीसी की सफल बातचीत के बाद ये तय किया गया है कि पाकिस्तान टी-20 वर्ल्ड कप के अपने सभी मैच खेलेगा.” अपने बयान में आईसीसी ने कहा, “आईसीसी और पीसीबी के बीच बातचीत व्यापक संपर्क प्रक्रिया का हिस्सा था, जिसमें दोनों पक्षों ने रचनात्मक तरीके से काम करने की ज़रूरत को माना और खेल के हितों के लिए ईमानदारी, निष्पक्षता और सहयोग के साथ एकजुट, प्रतिबद्ध और उद्देश्यपूर्ण रहने पर सहमति जताई.” आईसीसी ने आगे लिखा, “इसी भावना को ध्यान में रखते हुए ये तय हुआ कि सभी सदस्य आईसीसी आयोजनों में हिस्सा लेने की शर्तों के अनुसार अपनी प्रतिबद्धताओं का सम्मान करेंगे और यह सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे कि आईसीसी पुरुष टी-20 विश्व कप का मौजूदा संस्करण सफल हो.” बांग्लादेश के बारे में आईसीसी ने लिखा, “बांग्लादेश में क्रिकेट का बड़ा बाज़ार है और इसी को ध्यान में रखते हुए आईसीसी ने यहां क्रिकेट के विकास को लगातार बढ़ावा देने की अपनी भूमिका दोहराई है. यहां 20 करोड़ से ज़्यादा क्रिकेट फ़ैंस हैं. हमारी कोशिश है कि इस टूर्नामेंट में हिस्सा ना लेने का देश में क्रिकेट पर कोई दीर्घकालिक असर न पड़े.” इसी बयान में आईसीसी ने ये भी बताया कि टूर्नामेंट में ना खेलने के बांग्लादेश के फ़ैसले के बाद भी उस पर कोई जुर्माना नहीं लगाया जाएगा. श्रीलंका ने जताया आभारश्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने एक्स पर पोस्ट में पाकिस्तान का शुक्रिया कहा. उन्होंने लिखा, “शहबाज़ शरीफ़ आपका धन्यवाद. आपने ये सुनिश्चित किया कि हम सभी का पसंदीदा खेल जारी रहे. यह जानकर खुशी हुई कि कोलंबो में चल रहे टी-20 क्रिकेट विश्व कप में बहुप्रतीक्षित भारत-पाकिस्तान मैच तय कार्यक्रम के अनुसार खेला जाएगा. टूर्नामेंट के सह-मेज़बान के रूप में श्रीलंका, आईसीसी और इससे जुड़े सभी लोगों के प्रयासों के लिए धन्यवाद करता है. श्रीलंका ने 1996 विश्व कप के दौरान भारत और पाकिस्तान द्वारा दिखाई गई एकजुटता को नहीं भुलाया है, जब सुरक्षा चिंताओं के कारण दूसरे देश पीछे हट गए थे, तब दोनों टीमों ने कोलंबो में मैच खेले थे.” बांग्लादेश ने भी किया था अनुरोधइससे पहले सोमवार को बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीबी) ने पाकिस्तान से अपील की कि वो टी-20 वर्ल्ड कप 2026 में 15 फरवरी को भारत के खिलाफ होने वाला अपना मैच खेले. एक बयान में बीसीबी ने पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन मोहसिन रज़ा नक़वी, पीसीबी और पाकिस्तान के क्रिकेट प्रशंसकों के प्रति हार्दिक आभार जताया. बयान में कहा गया, “इस दौरान पीसीबी ने बेहतरीन खेल भावना और एकजुटता का प्रदर्शन किया है.” बीसीबी अध्यक्ष मोहम्मद अमीनुल इस्लाम ने कहा, “इस अवधि में बांग्लादेश के समर्थन में पाकिस्तान के ज़बरदस्त प्रयासों से हम बेहद प्रभावित हैं. हमारा भाईचारा लंबे समय तक फलता-फूलता रहे.” बीसीबी अध्यक्ष ने अपने बयान में आगे कहा, “कल पाकिस्तान की एक संक्षिप्त यात्रा के बाद और हमारी बातचीत के संभावित नतीजों को देखते हुए, मैं क्रिकेट के हित में पाकिस्तान से अनुरोध करता हूं कि वह 15 फरवरी को भारत के खिलाफ आईसीसी टी20 वर्ल्ड कप मैच खेले.” बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ मैच का बहिष्कार क्यों बदला?

पृष्ठभूमि

  • 1 फरवरी को पाकिस्तान ने घोषणा की थी कि उसकी टीम 15 फरवरी को भारत के खिलाफ होने वाले टी-20 वर्ल्ड कप मैच का बहिष्कार करेगी।
  • यह फैसला बांग्लादेश के समर्थन में लिया गया था, जिसने सुरक्षा चिंताओं के चलते भारत के खिलाफ मैच बाहर कराने की मांग की थी।
  • आईसीसी ने बांग्लादेश का अनुरोध खारिज कर दिया और उसकी जगह स्कॉटलैंड को टूर्नामेंट में शामिल कर लिया।

बैठक और बातचीत

  • 10 फरवरी को पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) अध्यक्ष मोहसिन नक़वी ने प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ को आईसीसी और बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के साथ हुई उच्च स्तरीय बैठक की जानकारी दी।
  • बैठक में क्रिकेट की भावना बनाए रखने और सभी सदस्य देशों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।
  • श्रीलंका, यूएई और अन्य मित्र देशों ने पाकिस्तान से मैच खेलने का अनुरोध किया।

सरकार का बयान

  • पाकिस्तान सरकार ने कहा कि मित्र देशों के अनुरोध को ध्यान में रखते हुए टीम को भारत के खिलाफ मैच खेलने की अनुमति दी गई है।
  • प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने श्रीलंका के राष्ट्रपति से बातचीत में स्वीकार किया कि दोनों देशों ने हमेशा मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ दिया है।
  • बयान में कहा गया कि यह निर्णय “क्रिकेट की भावना बनाए रखने और वैश्विक खेल की निरंतरता सुनिश्चित करने” के लिए लिया गया है।

आईसीसी का रुख़

  • आईसीसी ने पुष्टि की कि पाकिस्तान अपने सभी मैच खेलेगा।
  • बयान में कहा गया कि सभी सदस्य देशों को अपनी प्रतिबद्धताओं का सम्मान करना चाहिए और टूर्नामेंट की सफलता सुनिश्चित करनी चाहिए।
  • बांग्लादेश के बहिष्कार पर कोई जुर्माना नहीं लगाया गया।

मित्र देशों की प्रतिक्रिया

  • श्रीलंका के राष्ट्रपति ने पाकिस्तान का धन्यवाद किया और कहा कि भारत-पाकिस्तान मैच तय कार्यक्रम के अनुसार खेला जाएगा।
  • बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने भी पाकिस्तान के समर्थन और खेल भावना की सराहना की।

निष्कर्ष पाकिस्तान ने बहिष्कार का फैसला बदलकर मैच खेलने का निर्णय लिया क्योंकि:

  • आईसीसी और पीसीबी की बातचीत में क्रिकेट की भावना और वैश्विक खेल की निरंतरता पर जोर दिया गया।
  • श्रीलंका, बांग्लादेश और अन्य मित्र देशों ने पाकिस्तान से मैच खेलने का अनुरोध किया।
  • सरकार ने इसे अंतरराष्ट्रीय दबाव और क्रिकेट की एकजुटता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम माना।

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टी20 वर्ल्ड कप 2026: नामीबिया के ख़िलाफ़ नीदरलैंड्स ने जीता टॉस, पहले गेंदबाज़ी का फ़ैसलादिल्ली में खेले जा रहे आईसीसी मेन्स टी20 वर्ल्ड कप 2026 के ग्रुप ए के मैच में नामीबिया के ख़िलाफ़ नीदरलैंड्स ने टॉस जीत लिया है. नीदरलैंड्स ने पहले गेंदबाज़ी का फ़ैसला किया है. ये मैच दिल्ली के अरुण जेटली स्टेडियम में हो रहा है. इस टूर्नामेंट में नामीबिया का ये पहला मैच है, वहीं नीदरलैंड्स का ये दूसरा मैच है. नीदरलैंड्स का पहला मुक़ाबला 7 फ़रवरी को पाकिस्तान से हुआ था. कोलंबो में हुए शनिवार के मैच में पाकिस्तान ने नीदरलैंड्स को तीन विकेट से शिकस्त दी थी.

टी20 वर्ल्ड कप 2026: नीदरलैंड्स बनाम नामीबिया

दिल्ली के अरुण जेटली स्टेडियम में खेले जा रहे आईसीसी मेन्स टी20 वर्ल्ड कप 2026 के ग्रुप ए मुकाबले में नीदरलैंड्स ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी करने का फ़ैसला किया है।

मैच की अहम बातें

  • यह नामीबिया का टूर्नामेंट में पहला मैच है।
  • नीदरलैंड्स का यह दूसरा मैच है।
  • नीदरलैंड्स ने अपना पहला मुकाबला 7 फरवरी को कोलंबो में पाकिस्तान के खिलाफ खेला था, जिसमें पाकिस्तान ने तीन विकेट से जीत दर्ज की थी।

इस मैच में नामीबिया की टीम पहली बार मैदान पर उतर रही है, जबकि नीदरलैंड्स अपने शुरुआती हार के बाद जीत की तलाश में है।

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दिल्ली में ‘गुमशुदगी की घटनाओं’ पर मानवाधिकार आयोग ने क्या कहाराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने कहा है कि उसने जनवरी 2026 के पहले दो हफ़्तों में दिल्ली से 807 व्‍यक्तियों की गुमशुदगी की एक मीडिया रिपोर्ट पर स्‍वत: संज्ञान लिया है. पीआईबी की ओर से सोमवार को जारी प्रेस रिलीज़ में कहा गया है, “मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ जनवरी 2026 के पहले दो हफ़्तों में दिल्ली में 807 लोग लापता हुए. इनमें 191 नाबालिग और 616 वयस्क शामिल हैं. पुलिस ने अब तक 235 लोगों को खोजा है, जबकि 572 लोग अभी भी लापता हैं.” एनएचआरसी ने कहा है कि अगर रिपोर्ट सच है, तो यह मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला है. आयोग ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और दिल्ली पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर दो हफ़्ते के अंदर इस मामले पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है. न्यूज़ एजेंसी पीटीआई की हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें दिल्ली पुलिस के आधिकारिक डेटा का हवाला देते हुए ये बताया गया था कि 1 से 15 जनवरी के बीच कुल 807 लोग लापता हुए, जिसमें हर दिन औसतन 54 लोग लापता हुए. गुमशुदगी के मामलों पर दिल्ली पुलिस की अपील इसके बाद दिल्ली पुलिस ने लोगों से अपील की थी कि वे ‘बच्चों की गुमशुदगी के मामलों में अचानक वृद्धि’ की अफ़वाहों पर भरोसा न करें. दिल्ली पुलिस ने एक्स पर पोस्ट किया, “हम नागरिकों से अपील करते हैं कि वे लापता बच्चों के मामलों में अचानक वृद्धि की अफ़वाहों का शिकार न हों.” दिल्ली पुलिस ने ‘लापता बच्चों के मामलों में अचानक वृद्धि’ के दावों का खंडन किया है. साथ ही, अफ़वाह फैलाने वालों को आंकड़ों को गलत तरीके से पेश करके बेवजह डर फ़ैलाने के लिए कड़ी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी है. दिल्ली पुलिस ने कहा था कि “घबराने या डरने की कोई बात नहीं है” क्योंकि ये आंकड़े पिछले सालों की इसी अवधि की तुलना में असल में कमी दिखाते हैं. दिल्ली पुलिस के जन संपर्क अधिकारी और संयुक्त पुलिस आयुक्त संजय त्यागी ने कहा था, “दिल्ली में लापता व्यक्तियों विशेषकर बच्चों के संबंध में घबराने या डरने की कोई वजह नहीं है.” “पहले की तुलना में दिल्ली में लापता व्यक्तियों के मामलों में कोई वृद्धि नहीं हुई है. जनवरी 2026 के महीने में पिछले वर्षों की समान अवधि की तुलना में गुमशुदगी के मामलों में कमी दर्ज की गई है.”

दिल्ली में गुमशुदगी की घटनाओं पर एनएचआरसी की प्रतिक्रिया

स्वत: संज्ञान

  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने जनवरी 2026 के पहले दो हफ़्तों में दिल्ली से 807 लोगों की गुमशुदगी की मीडिया रिपोर्ट पर स्वत: संज्ञान लिया है।
  • इनमें 191 नाबालिग और 616 वयस्क शामिल बताए गए हैं।
  • पुलिस अब तक 235 लोगों को खोज चुकी है, जबकि 572 लोग अभी भी लापता हैं।

एनएचआरसी का रुख़

  • आयोग ने कहा कि अगर रिपोर्ट सही है तो यह मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला है।
  • दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और दिल्ली पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी कर दो हफ़्तों में विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है।

दिल्ली पुलिस की प्रतिक्रिया

  • दिल्ली पुलिस ने कहा कि “लापता बच्चों के मामलों में अचानक वृद्धि” की अफ़वाहों पर भरोसा न करें।
  • पुलिस ने स्पष्ट किया कि आंकड़े पिछले वर्षों की तुलना में कमी दिखाते हैं।
  • अफ़वाह फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई।
  • संयुक्त पुलिस आयुक्त संजय त्यागी ने कहा कि “घबराने या डरने की कोई वजह नहीं है।”

सारांश एनएचआरसी ने गुमशुदगी की घटनाओं को गंभीरता से लिया है और दिल्ली सरकार व पुलिस से रिपोर्ट मांगी है। वहीं दिल्ली पुलिस का कहना है कि गुमशुदगी के मामलों में कोई असामान्य वृद्धि नहीं हुई है और अफ़वाहों से बचना चाहिए।

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पूर्व क्रिकेटर मदन लाल बोले- अच्छा है कि पाकिस्तान खेल रहा है, वरना टूर्नामेंट का चार्म कम हो जाताटी20 क्रिकेट वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के भारत के साथ मैच खेलने के लिए तैयार होने के फ़ैसले पर पूर्व भारतीय क्रिकेटर मदन लाल ने प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा, “अच्छा है कि वे खेल रहे हैं, वरना टूर्नामेंट का चार्म कम हो जाता, और उन्हें भी बड़ा फ़ाइनेंशियल नुक़सान होता.” “सुनने में आया है कि बांग्लादेश और श्रीलंका ने थोड़ा सा प्रेशर डाला था उनके ऊपर…नुक़सान श्रीलंका का भी था क्योंकि उनको भी रेवेन्यू वगैरह जनरेट होना था.” मदन लाल ने कहा कि इस पूरे मामले को पहले ही डिप्लोमैटिक तरीक़े से सुलझा लेना चाहिए था. उन्होंने कहा, “पाकिस्तान ने भी आईसीसी को हिला दिया है. आख़िर तक वो मना कर रहे थे खेलने के लिए फिर आईसीसी के अधिकारी पाकिस्तान गए और ये समस्या सुलझी है और मैं समझता हूं कि इसे पहले ही डिप्लोमैटिक तरीक़े से सुलझा लेना चाहिए था.” भारत-पाकिस्तान के मैच पर उन्होंने कहा, “भारत-पाकिस्तान मैच हमेशा रोमांचक ही होता है. दोनों टीमें बहुत बेहतरीन हैं. हमारी टीम लगातार काफ़ी अच्छा खेल रही है. दोनों टीम पर प्रेशर होता है.” “पाकिस्तान टीम पर थोड़ा ज़्यादा प्रेशर हो सकता है क्योंकि उन्होंने हाल ही में भारत के ख़िलाफ़ ज़्यादा मैच जीते नहीं हैं…दर्शकों को भी काफ़ी मजा आएगा क्योंकि वर्ल्ड कप हो रहा है क्रिकेट का खेल कमज़ोर नहीं होना चाहिए.”

पूर्व भारतीय क्रिकेटर मदन लाल ने पाकिस्तान के भारत के खिलाफ टी20 वर्ल्ड कप मैच खेलने के फ़ैसले पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है।

मदन लाल की प्रतिक्रिया

  • उन्होंने कहा, “अच्छा है कि वे खेल रहे हैं, वरना टूर्नामेंट का चार्म कम हो जाता, और उन्हें भी बड़ा फ़ाइनेंशियल नुक़सान होता।”
  • मदन लाल के अनुसार, बांग्लादेश और श्रीलंका ने पाकिस्तान पर दबाव डाला था क्योंकि श्रीलंका को भी राजस्व (रेवेन्यू) का नुकसान हो सकता था।
  • उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान ने आईसीसी को “हिला दिया” क्योंकि आख़िर तक वे खेलने से मना कर रहे थे, फिर आईसीसी अधिकारियों के हस्तक्षेप से मामला सुलझा।

भारत-पाकिस्तान मैच पर टिप्पणी

  • मदन लाल ने कहा कि भारत-पाकिस्तान मैच हमेशा रोमांचक होता है और दोनों टीमें बेहतरीन हैं।
  • उन्होंने माना कि पाकिस्तान पर थोड़ा ज़्यादा दबाव होगा क्योंकि हाल के वर्षों में उन्होंने भारत के खिलाफ ज़्यादा मैच नहीं जीते हैं।
  • दर्शकों के लिए यह मैच बेहद मज़ेदार होगा और क्रिकेट का आकर्षण बरकरार रहेगा।

👉 साफ़ है कि मदन लाल इस फ़ैसले को टूर्नामेंट और क्रिकेट की प्रतिष्ठा के लिए अहम मानते हैं।

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पीयूष गोयल बोले- तो टी20 वर्ल्ड कप मुक़ाबले में भारत से जीत जाता अमेरिकाभारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर के घर पर सोमवार को रखे गए एक समारोह में भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने दोनों देशों के बीच हुए मैच और टैरिफ़ को लेकर एक मज़ाक किया. मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में हुए भारत-अमेरिका मुक़ाबले का ज़िक्र करते हुए पीयूष गोयल ने कहा, “अमेरिका ने भले ही (भारत के ख़िलाफ़) मैच नहीं जीता हो, लेकिन एक ऐसे देश के लिए जिसने कुछ साल पहले ही में क्रिकेट खेलना शुरू किया है, उनका प्रदर्शन शानदार था.” उन्होंने कहा, “सर्जियो भी वहां मैच का आनंद लेने के लिए मौजूद थे…उन्होंने (सर्जियो गोर ने) एक अहम फ़ैक्ट बताया कि अमेरिका मैच 18 परसेंट से हार गया.” पीयूष गोयल ने आगे कहा कि ‘अगर आपने रेसिप्रोकल टैरिफ़ ज़ीरो कर दिया होता, तो शायद आप मैच जीत जाते’, उनके ये कहते ही वहां मौजूद लोग हंसने लगे. शनिवार, 7 फ़रवरी को खेले गए टी20 वर्ल्ड कप के अपने पहले मुक़ाबले में भारत ने अमेरिका को 29 रन से मात दी. भारत ने पहले बल्लेबाज़ी करते अमेरिका के सामने जीत के लिए 20 ओवर में 162 रन का लक्ष्य रखा था. लेकिन अमेरिका की टीम 20 ओवर में आठ विकेट गंवाकर 132 रन ही बना पाई थी.

भारत-अमेरिका मैच को लेकर वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने एक हल्का-फुल्का मज़ाक किया।

समारोह में गोयल की टिप्पणी

  • दिल्ली में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर के घर आयोजित समारोह में गोयल ने कहा कि अमेरिका ने भले ही भारत के खिलाफ मैच नहीं जीता, लेकिन उनका प्रदर्शन शानदार था क्योंकि उन्होंने हाल ही में क्रिकेट खेलना शुरू किया है।
  • उन्होंने मज़ाक करते हुए कहा, “अगर आपने रेसिप्रोकल टैरिफ़ ज़ीरो कर दिया होता, तो शायद आप मैच जीत जाते।”
  • इस टिप्पणी पर मौजूद लोग हंस पड़े।

मैच का संदर्भ

  • 7 फरवरी को मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेले गए टी20 वर्ल्ड कप मुकाबले में भारत ने अमेरिका को 29 रन से हराया।
  • भारत ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए 162 रन का लक्ष्य दिया था।
  • अमेरिका की टीम 20 ओवर में 132 रन ही बना सकी और आठ विकेट खो दिए।

👉 गोयल की यह टिप्पणी क्रिकेट और व्यापारिक रिश्तों को जोड़ते हुए एक डिप्लोमैटिक ह्यूमर का उदाहरण है, जिससे माहौल हल्का-फुल्का बना रहा।

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वीडियो: बांग्लादेश के संसदीय चुनाव में जमात-ए-इस्लामी की हार या जीत पर क्यों है भारत की नज़र?बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव होने वाले हैं. इन चुनावों में एक अहम दावेदार जमात-ए-इस्लामी भी है. जमात, जिस पर शेख़ हसीना ने चुनाव लड़ने से प्रतिबंध लगाया था, अपनी विचारधाराओं की वजह से दुनिया और भारत का ध्यान आकर्षित कर रही है. पड़ोसी देश के इन चुनावों में जमात की तक़दीर क्या होगी, इस पर भारत नज़र रख रहा है. अगर बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी सत्ता में आती है, तो उसका बांग्लादेश के समाज और राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? देखिए इशाद्रिता लाहिड़ी और देबलिन रॉय की ग्राउंड रिपोर्ट.

भारत की नज़र बांग्लादेश के संसदीय चुनावों पर इसलिए है क्योंकि इनमें जमात-ए-इस्लामी की भूमिका अहम मानी जा रही है।

भारत क्यों देख रहा है जमात की स्थिति

  • राजनीतिक पृष्ठभूमि: जमात-ए-इस्लामी पर शेख़ हसीना सरकार ने चुनाव लड़ने से प्रतिबंध लगाया था। इसके बावजूद संगठन की विचारधारा और प्रभाव बांग्लादेश की राजनीति में मौजूद है।
  • सुरक्षा और स्थिरता: भारत के लिए पड़ोसी देश में कट्टरपंथी विचारधारा वाली पार्टी का मज़बूत होना सुरक्षा चिंता का विषय है।
  • क्षेत्रीय राजनीति पर असर: जमात का उदय बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति और समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा सकता है, जिसका असर भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी पड़ सकता है।
  • आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते: भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापार, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग अहम हैं। जमात की मज़बूत स्थिति इन रिश्तों को प्रभावित कर सकती है।

चुनावी परिदृश्य

  • 12 फरवरी को होने वाले चुनावों में जमात की किस्मत तय होगी।
  • भारत इस पर नज़र रख रहा है क्योंकि परिणाम बांग्लादेश की राजनीतिक दिशा और भारत के साथ उसके संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं।

👉 यह चुनाव केवल बांग्लादेश की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता और भारत की रणनीतिक चिंताओं से भी जुड़ा है।

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भारत के साथ अब मैच खेलने के लिए तैयार हुए पाकिस्तान पर क्या बोले विराट कोहली के पूर्व कोचटी20 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान का पहले भारत के ख़िलाफ़ मैच बहिष्कार करने की घोषणा और फ़िर खेलने के लिए राज़ी होने के पूरे घटनाक्रम को विराट कोहली के पूर्व कोच राज कुमार शर्मा ने ‘ड्रामा’ बताया है. न्यूज़ एजेंसी एएनआई से बातचीत में राज कुमार शर्मा ने कहा, “ये ड्रामा ही था पाकिस्तान का, जो वो हमेशा से करता आया है. बांग्लादेश को उन्होंने सपोर्ट करके उनको बाहर (टी20 वर्ल्ड कप से) करा दिया.” “अब उनको एहसास हुआ कि अगर वो भारत के साथ नहीं खेलेंगे तो उनका कितना नुक़सान होगा. तो ये अपेक्षित है, पाकिस्तान से ऐसी चीज़ें, जो उन्होंने इस बार भी किया.” पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने पाकिस्तानी क्रिकेट टीम को 15 फ़रवरी को भारत के ख़िलाफ़ टी20 वर्ल्ड कप मैच खेलने की अनुमति दे दी है. उन्होंने कहा है कि यह फ़ैसला मित्र देशों के अनुरोध पर लिया गया है.

विराट कोहली के पूर्व कोच राज कुमार शर्मा ने पाकिस्तान के भारत के खिलाफ टी20 वर्ल्ड कप मैच खेलने के फ़ैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।

राज कुमार शर्मा की टिप्पणी

  • उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को “ड्रामा” बताया।
  • उनके अनुसार, पाकिस्तान ने पहले बांग्लादेश का समर्थन करके उसे टूर्नामेंट से बाहर कराया और फिर खुद खेलने से इनकार किया।
  • उन्होंने कहा, “अब उनको एहसास हुआ कि अगर वो भारत के साथ नहीं खेलेंगे तो उनका कितना नुक़सान होगा। पाकिस्तान से ऐसी चीज़ें अपेक्षित हैं, जो उन्होंने इस बार भी किया।”

पृष्ठभूमि

  • पाकिस्तान ने शुरुआत में भारत के खिलाफ 15 फरवरी का मैच बहिष्कार करने का ऐलान किया था।
  • बाद में प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने मित्र देशों के अनुरोध पर टीम को खेलने की अनुमति दी।
  • इस बदलाव को लेकर क्रिकेट जगत और विशेषज्ञों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं।

👉 राज कुमार शर्मा की टिप्पणी यह दिखाती है कि भारत-पाकिस्तान मैच केवल खेल नहीं बल्कि राजनीति और कूटनीति से भी जुड़ा हुआ माना जाता है।

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