मध्य-पूर्व: ईरान पर अमेरिकी हमले की आशंका के बीच सऊदी अरब और यूएई ने घोषणा की है कि वे अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए नहीं होने देंगे। अज़रबैजान ने भी इसी तरह का रुख अपनाया है। 📌 अरब देशों का रुख सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से बातचीत में कहा कि उनका हवाई क्षेत्र हमले के लिए इस्तेमाल नहीं होगा। यूएई ने भी पहले ही यह घोषणा कर दी थी। तुर्की ने भी स्पष्ट किया है कि वह ईरान के खिलाफ़ किसी भी सैन्य हस्तक्षेप का विरोध करता है। ⚖️ अमेरिका की स्थिति राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी है कि समय कम है और उसे परमाणु कार्यक्रम व मिसाइल विकास पर समझौता करना होगा। अमेरिकी रक्षा मंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति को जो भी सैन्य विकल्प चाहिए, वे उपलब्ध कराए जाएंगे। अमेरिका ने विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और मिसाइल डेस्ट्रॉयर मध्य-पूर्व में तैनात किए हैं। 🌍 क्या हवाई क्षेत्र बंद करने से हमला रुकेगा? वाल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी और यूएई का यह कदम ट्रंप प्रशासन की योजनाओं को जटिल बना देगा, लेकिन रोक नहीं पाएगा। अमेरिका के पास विकल्प हैं: जॉर्डन, सीरिया और इराक़ के हवाई क्षेत्र से बमवर्षक भेजना। अरब सागर में तैनात विमानवाहक पोत से हमले करना। पनडुब्बियों से क्रूज़ मिसाइल दागना। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे अमेरिकी अभियान अधिक “अमेरिकी स्वरूप” का होगा, न कि क्षेत्रीय गठबंधन वाला। ✨ निष्कर्ष सऊदी और यूएई का हवाई क्षेत्र बंद करना अमेरिका के लिए लॉजिस्टिक चुनौती है, लेकिन यह उसे पूरी तरह रोक नहीं सकता। हाँ, इससे क्षेत्रीय देशों की एकजुटता का संदेश जाता है और ईरान पर हमले की राजनीतिक वैधता कमजोर होती है। यह स्थिति दिखाती है कि मध्य-पूर्व के देश अब सीधे युद्ध में घसीटे जाने से बचना चाहते हैं। अमेरिका चाहे तो हमला कर सकता है, लेकिन बिना क्षेत्रीय सहयोग के उसकी लागत और जोखिम कहीं अधिक बढ़ जाएंगे। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation ईरान में इस्लामिक शासन के ख़िलाफ़ बड़े प्रदर्शन: क्या इतिहास दोहराया जाएगा? सुनीता विलियम्स: अंतरिक्ष से मिली सीख और भारत से जुड़ाव