पृष्ठभूमि 7 फरवरी को असम बीजेपी के आधिकारिक X हैंडल पर एक वीडियो पोस्ट किया गया जिसमें मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को राइफ़ल संभालते हुए दिखाया गया। वीडियो में एआई से तैयार किए गए दृश्य थे, जिनमें दाढ़ी और सफ़ेद टोपी पहने पुरुषों पर गोलियाँ चलती दिखाई गईं। इसमें “फ़ॉरेनर फ़्री असम” और “नो मर्सी” जैसे संदेश भी थे।

विवाद और आलोचना

  • विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और कई यूज़र्स ने इसे भड़काऊ और ख़तरनाक बताया।
  • कांग्रेस ने इसे “अल्पसंख्यकों की पॉइंट-ब्लैंक हत्या का महिमामंडन” कहा और नरसंहार जैसी सोच को बढ़ावा देने वाला बताया।
  • टीएमसी ने इसे “राज्य समर्थित कट्टरपंथीकरण” कहा।
  • वरिष्ठ पत्रकार अफ़रीदा हुसैन ने इसे लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बताया और कहा कि वीडियो हटाना पर्याप्त नहीं है क्योंकि नफ़रत पहले ही फैल चुकी है।

बीजेपी ने पोस्ट क्यों हटाई

  • सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया और आलोचना।
  • कानूनी कार्रवाई की आशंका, क्योंकि वीडियो को हिंसा भड़काने वाला माना गया।
  • चुनावी नुकसान से बचने के लिए “डैमेज कंट्रोल”।

राजनीतिक मायने

  • ध्रुवीकरण की रणनीति: असम की राजनीति लंबे समय से पहचान, नागरिकता और प्रवासन के मुद्दों पर टिकी रही है। यह वीडियो चुनावी ध्रुवीकरण को तेज़ करने की कोशिश माना जा रहा है।
  • ‘मियां’ मुसलमानों पर फोकस: सरमा पहले से ही इस समुदाय पर सख़्त बयान देते रहे हैं। वीडियो उसी रुख़ का विस्तार था।
  • लोकप्रियता और असुरक्षा: विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार अपनी लोकप्रियता को लेकर आश्वस्त नहीं है, इसलिए ध्रुवीकरण की ओर झुकाव बढ़ा है।
  • राष्ट्रीय राजनीति में छवि निर्माण: सरमा खुद को कट्टर हिंदुत्ववादी नेता और स्थानीय हितों के रक्षक दोनों रूपों में पेश करना चाहते हैं।
  • चुनावी असर अनिश्चित: ध्रुवीकरण से हर बार राजनीतिक फ़ायदा मिलेगा, यह तय नहीं है। लेकिन इससे समाज में विभाजन गहरा हो सकता है।

निष्कर्ष वीडियो हटाना बीजेपी का रक्षात्मक कदम था, लेकिन विवाद ने यह साफ़ कर दिया कि असम की राजनीति में चुनावी विमर्श पहचान और घुसपैठ जैसे संवेदनशील मुद्दों पर ही केंद्रित रहेगा।

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