नई दिल्ली/बीजिंग/वॉशिंगटन: भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील को विशेषज्ञ चीन के लिए चुनौती मान रहे हैं। भले ही भारत-चीन का द्विपक्षीय व्यापार 2025 में रिकॉर्ड 155 अरब डॉलर तक पहुंच गया हो, लेकिन अमेरिका के साथ भारत की नई साझेदारी चीन की आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को प्रभावित कर सकती है।

📌 चीन को कैसे नुक़सान हो सकता है?

  • चीन प्लस वन रणनीति: कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत जैसे देशों में निवेश बढ़ा रही हैं। इससे चीन की मैन्युफ़ैक्चरिंग और निर्यात पर दबाव पड़ेगा।
  • टैरिफ़ का अंतर: अमेरिका ने चीन पर 34% टैरिफ़ लगाया है, जबकि भारत पर यह घटकर 18% रह गया है। इससे अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पादों को बढ़त मिलेगी।
  • रेयर अर्थ कॉरिडोर: भारत ने ओडिशा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने का एलान किया है। चीन इस क्षेत्र में सबसे बड़ा सप्लायर है, लेकिन भारत की पहल उसके एकाधिकार को चुनौती दे सकती है।
  • वैश्विक सप्लाई चेन: अमेरिका और यूरोप चीन के सामान पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी और प्रतिबंध लगा रहे हैं। इससे भारत को वैकल्पिक सप्लाई चेन के रूप में फायदा मिलेगा।

⚖️ चीन की प्रतिक्रिया

  • चीन के सरकारी मीडिया ने भारत-अमेरिका डील की स्थिरता पर सवाल उठाए हैं।
  • ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि भारत रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद नहीं करेगा और “शैडो फ़्लीट” का इस्तेमाल जारी रख सकता है।
  • शंघाई के अख़बार यिकाई ने पूछा कि क्या भारत वास्तव में अमेरिका से 500 अरब डॉलर का आयात कर पाएगा, जबकि अभी यह सिर्फ़ 41.5 अरब डॉलर है।

✨ निष्कर्ष

भारत-अमेरिका ट्रेड डील चीन के लिए सीधा आर्थिक झटका नहीं है, लेकिन यह उसकी दीर्घकालिक रणनीतिक बढ़त को कमजोर कर सकती है। “चीन प्लस वन” नीति और अमेरिकी टैरिफ़ अंतर भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में अधिक आकर्षक विकल्प बना रहे हैं।

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