तेहरान: ईरान में महंगाई, आर्थिक असमानता और दमनकारी नीतियों के खिलाफ़ शुरू हुए विरोध प्रदर्शन अब सत्ता परिवर्तन की मांग में बदल गए हैं। 📌 हालात रियाल डॉलर के मुकाबले सबसे निचले स्तर पर है और महंगाई 40% तक पहुँच गई है। दुकानदारों की हड़ताल और छात्रों के विरोध ने आंदोलन को व्यापक बना दिया। सुरक्षाबलों और प्रदर्शनकारियों की झड़पों में हज़ारों लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है। मानवाधिकार गुटों का कहना है कि असली संख्या इससे कहीं अधिक है। ⚖️ विपक्ष का चेहरा: रज़ा पहलवी प्रदर्शनों के दौरान निर्वासन में रह रहे युवराज रज़ा पहलवी का नाम विपक्षी नेता के रूप में उभर रहा है। बीबीसी पर्शिया के वरिष्ठ पत्रकार सियावाश अर्दलान के अनुसार, पहली बार बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी उन्हें देश लौटने की अपील कर रहे हैं। अधिकांश युवा जिन्होंने शाह का शासन नहीं देखा था, अब धर्मनिरपेक्षता और संपन्नता की उम्मीद में पहलवी को समर्थन दे रहे हैं। 🌍 सरकार बनाम जनता ईरान सरकार का दावा है कि ये प्रदर्शन “विदेशी दुश्मनों द्वारा भड़काए गए दंगे” हैं। लेकिन जनता का गुस्सा प्रशासनिक बयानों से भी बढ़ा है, जैसे कि “दिन में तीन बार के बजाय दो बार खाना खाने” की सलाह। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान में 10–15% कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोग सरकार का समर्थन करते हैं, लेकिन बाकी जनता बदलाव चाहती है। ✨ क्या इतिहास दोहराया जाएगा? 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहली बार ईरान की सत्ता को इतनी बड़ी चुनौती मिल रही है। तब शाह को हटाकर अयातुल्लाह ख़ुमैनी सत्ता में आए थे। आज, लगभग 50 साल बाद, जनता फिर से इस्लामिक शासन से आज़ादी की मांग कर रही है। फर्क यह है कि अब सरकार की पकड़ कहीं अधिक मज़बूत है और दमन का स्तर भी बहुत ऊँचा है। यह स्थिति ईरान के लिए ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकती है। सवाल यही है कि क्या जनता का गुस्सा और विपक्ष की नई आकांक्षाएँ 1979 की तरह सत्ता परिवर्तन ला पाएंगी, या सरकार का कठोर दमन आंदोलन को दबा देगा। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation चीन ने इलेक्ट्रिक कारों में छिपे दरवाज़े के हैंडल पर लगाया बैन सऊदी और यूएई का हवाई क्षेत्र बंद करने का फ़ैसला: क्या अमेरिका को ईरान पर हमले से रोका जा सकता है?