हाल ही में अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के साथ हुए व्यापार समझौतों ने वैश्विक व्यापार में भारत के बढ़ते आत्मविश्वास को दिखाया है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इन समझौतों का असली लाभ उठाने के लिए भारत को दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानियों तक कड़े घरेलू सुधार करने होंगे। मुख्य विश्लेषण: व्यापार नीति में बदलाव: भारत अब संरक्षणवाद (Protectionism) से हटकर घरेलू सहायता कार्यक्रमों (जैसे PLI स्कीम) और आक्रामक व्यापार समझौतों पर ध्यान दे रहा है। पिछले तीन वर्षों में भारत ने छह महत्वपूर्ण समझौते किए हैं। ‘मेक इन इंडिया’ की चुनौतियां: 2014 में शुरू हुए ‘मेक इन इंडिया’ का लक्ष्य मैन्युफैक्चरिंग को GDP का 25% करना था, लेकिन यह आंकड़ा अभी भी पीछे है। श्रम कानूनों और विदेशी निवेश के नियमों में ढील देने के बावजूद जमीन पर बड़े सुधारों की जरूरत है। राज्यों की बड़ी भूमिका: रिपोर्ट के अनुसार, सुधारों का बोझ केवल दिल्ली पर नहीं, बल्कि बॉम्बे से भुवनेश्वर और चेन्नई से पटना तक भारत के 28 राज्यों पर है। निवेशकों को आकर्षित करने के लिए राज्यों को निम्नलिखित क्षेत्रों में काम करना होगा: पारदर्शी भूमि अधिग्रहण: फैक्ट्रियों के लिए जमीन मिलने की प्रक्रिया को आसान बनाना। लेबर फ्लेक्सिबिलिटी: श्रम कानूनों में लचीलापन लाना। बिजली और बुनियादी ढांचा: बिजली की कीमतों में सुधार और इसकी निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना। विवादों का जल्द निपटारा: कानूनी अड़चनों को तेजी से दूर करना। संतुलन की जरूरत: भारत ने कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों (खासकर अनाज) में सुरक्षा बनाए रखी है, लेकिन तकनीक और श्रम-प्रधान (Labour-intensive) क्षेत्रों में वह टैरिफ कम करने के लिए तैयार है। निष्कर्ष: अमेरिका और भारत के बीच हुआ अंतरिम समझौता तनाव कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत के राज्य अपने यहाँ व्यापार करने के माहौल (Ease of Doing Business) को कितना बेहतर बना पाते हैं। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation भारतीय टेक्सटाइल के लिए ‘0% टैरिफ’ डील: पीयूष गोयल बोले- अमेरिका में भारत को मिलेंगे बांग्लादेश जैसे फायदे ट्रंप का दावा बनाम जमीनी हकीकत: क्या वाकई रूसी तेल की जगह ले पाएगा अमेरिकी तेल?