बेंगलुरु: अगर आप सोचते हैं कि लग्जरी बैग्स (जैसे हर्मीस बर्किन) या आईफोन के नए मॉडल के लिए ही लोग लाइनों में लगते हैं, तो आप गलत हैं। 2026 के भारत में ‘मैसूर सिल्क साड़ी’ (Mysore Silk Saree) एक ऐसा स्टेटस सिंबल बन गई है, जिसे पाने के लिए महिलाएं सुबह 4 बजे से ही शोरूम के बाहर कतारों में खड़ी नजर आ रही हैं।

हाल ही में बेंगलुरु में कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन (KSIC) के शोरूम के बाहर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है, जिसने इंटरनेट को दो हिस्सों में बांट दिया है।

क्यों है इतना क्रेज? क्या यह भारत का ‘बर्किन’ है?

विशेषज्ञों का मानना है कि मैसूर सिल्क ने अब ‘बर्किन’ जैसा दर्जा हासिल कर लिया है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:

  1. युवाओं की पसंद: जो रेशम कभी ‘आंटी-कोडेड’ माना जाता था, उसे अब नई पीढ़ी (Gen-Z और Millennials) बड़े चाव से पहन रही है।
  2. डिजाइन में बदलाव: 2023 के बाद से KSIC ने पेस्टल रंगों और ऑफिस-वियर के अनुकूल करीब 30 नए डिजाइन पेश किए हैं, जिससे इसकी मांग कई गुना बढ़ गई है।

इतनी लंबी लाइनें क्यों?

बढ़ती मांग के बावजूद इसकी सप्लाई सीमित है क्योंकि:

  • कारीगरी में समय: एक बुनकर को मास्टर बनने में 1 से 4 साल का समय लगता है। यह कोई फैक्ट्री प्रोडक्ट नहीं है जिसे रातों-रात दोगुना किया जा सके।
  • अनोखी रंगाई (Dyeing): मैसूर सिल्क की चमक का राज इसकी 200 साल पुरानी ‘पोस्ट-वीव डाइंग’ तकनीक है, जिसमें साड़ी बुनने के बाद उसे रंगा जाता है।
  • शुद्धता की गारंटी: KSIC की हर साड़ी पर एक यूनीक नंबर होता है, जो उसकी शुद्धता और असली होने की पहचान है।

कीमत और विरासत

मैसूर सिल्क साड़ियों की कीमत 23,000 रुपये से शुरू होकर 1 लाख रुपये से ऊपर तक जाती है। इसमें शुद्ध सोने और चांदी की जरी का इस्तेमाल होता है। लोग इसे केवल एक कपड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘विरासत’ (Heirloom) के रूप में देख रहे हैं जिसे अगली पीढ़ियों को सौंपा जा सकता है।

इतिहास की झलक

मैसूर सिल्क का इतिहास 1790 के दशक में टीपू सुल्तान के समय से शुरू होता है और बाद में वोडेयार राजवंश के दौरान इसे आधुनिक पहचान मिली। आज यह भारत की उन चुनिंदा संस्थाओं में से एक है जो कोकून से लेकर साड़ी तैयार होने तक की पूरी प्रक्रिया खुद नियंत्रित करती है।

निष्कर्ष: 2026 में भारत के लिए लग्जरी का मतलब केवल विदेशी ब्रांड नहीं है। असली स्टेटस सिंबल मैसूर की करघों (looms) पर बुना जा रहा है, और अगर आप इसे खरीदना चाहते हैं, तो शायद आपको भी सूरज उगने से पहले लाइन में लगना पड़े।

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