नई दिल्ली | 17 फरवरी, 2026 | एजुकेशन एंड कॉर्पोरेट डेस्क

“नमस्कार, आप देख रहे हैं ‘भविष्य का भारत’। आज भारत में लाखों युवा हर साल ग्रेजुएट हो रहे हैं, लेकिन क्या वे वास्तव में नौकरी के लिए तैयार हैं? हालिया रिपोर्ट्स और एचआर लीडर्स के बयान एक डराने वाली तस्वीर पेश कर रहे हैं। रट्टा मार पढ़ाई (Rote Learning) और किताबी ज्ञान ने युवाओं को परीक्षा में तो पास कर दिया, लेकिन दफ्तर की चुनौतियों में वे फेल हो रहे हैं। आखिर क्यों भारतीय शिक्षा तंत्र को तुरंत ‘सर्जरी’ की जरूरत है? आइए जानते हैं।

न्यूज़ हेडलाइन्स (Main Highlights)

  • 68% प्रोफेशनल्स की राय: एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 68% एचआर विशेषज्ञ मानते हैं कि फ्रेशर्स में ‘अनुकूलन क्षमता’ (Adaptability) और ‘डिजिटल साक्षरता’ की भारी कमी है।
  • एआई (AI) का खतरा: नैसकॉम (NASSCOM) 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में एआई-रेडी प्रोफेशनल्स की 50% कमी है, जबकि अगले कुछ वर्षों में एआई 40% नौकरियों का स्वरूप बदल देगा।
  • सॉफ्ट स्किल्स का अभाव: 50-60% युवा पेशेवर केवल इसलिए नौकरी छोड़ देते हैं या निकाल दिए जाते हैं क्योंकि उनमें टीम वर्क और संवाद (Communication) की कमी होती है।
  • डिग्री बनाम स्किल: कंपनियां अब किताबी ज्ञान से ज्यादा ‘लर्निंग एजिलिटी’ (सीखने की क्षमता) को महत्व दे रही हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट: कहाँ पिछड़ रहे हैं हमारे छात्र?

[रिपोर्टर वॉयसओवर]
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि बिजनेस की जरूरतें जितनी तेजी से बदल रही हैं, स्कूलों और कॉलेजों का सिलेबस उतनी तेजी से अपडेट नहीं हो रहा।

बड़ी चुनौतियां:

  1. किताबी कीड़ा बनाम प्रॉब्लम सॉल्वर: छात्र थ्योरी तो जानते हैं, लेकिन जब उन्हें वास्तविक प्रोजेक्ट्स या डेटा एनालिसिस (Excel Pivot, Automation) का काम दिया जाता है, तो वे संघर्ष करते हैं।
  2. डिजिटल साक्षरता का संकट: आज भी कई विश्वविद्यालयों में एआई टूल्स और डेटा एनालिटिक्स को केवल ‘ऑप्शनल’ विषय माना जाता है, जबकि ये अब हर नौकरी की बुनियादी जरूरत हैं।
  3. इमोशनल इंटेलिजेंस की कमी: हाइब्रिड वर्क कल्चर में टीम के साथ तालमेल बिठाना और दबाव में काम करना जरूरी है, जिस पर क्लासरूम में कभी ध्यान नहीं दिया जाता।

शिक्षा में बदलाव के लिए 3 बड़े सुझाव

  • इंडस्ट्री-एकेडमिया पार्टनरशिप: कॉलेजों को एचआर लीडर्स के साथ मिलकर अपना सिलेबस तैयार करना चाहिए।
  • आउटकम-बेस्ड लर्निंग: सफलता का पैमाना सिर्फ ‘मार्क्स’ नहीं, बल्कि ‘रोजगार पाने की क्षमता’ (Job Readiness) होनी चाहिए।
  • माइक्रो-क्रेडेंशियल्स: 4 साल की एक डिग्री के बजाय, समय-समय पर छोटे-छोटे सर्टिफिकेशन और स्किल-बेस्ड कोर्सेज (Stackable Credentials) को बढ़ावा देना चाहिए।

निष्कर्ष

एचआर लीडर्स का कहना है कि वे शिक्षा जगत के दुश्मन नहीं, बल्कि ‘पार्टनर’ बनना चाहते हैं। अगर हम आज नहीं सुधरे, तो स्किल्स पुरानी (Obsolete) हो जाएंगी और बेरोजगारी का संकट गहरा जाएगा। नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में इसके प्रावधान तो हैं, लेकिन अब ज़रूरत है इन्हें ज़मीनी स्तर पर लागू करने की।

[एंकर साइन-ऑफ]
“डिग्री सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा न रह जाए, इसके लिए हुनर का साथ होना ज़रूरी है। न्यूज़ डेस्क से मैं [AI सहायक], कैमरामैन के साथ।”

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