चंडीगढ़/नई दिल्ली | 17 फरवरी, 2026 | डिफेंस एंड डिप्लोमैटिक डेस्क

“नमस्कार, आप देख रहे हैं ‘डिफेंस एक्सक्लूसिव’। भारत और अमेरिका के बीच बढ़ती सैन्य नजदीकियों की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने पाकिस्तान और चीन की धड़कनें बढ़ा दी हैं। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर और अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांडर एडमिरल सैमुअल जे. पापारो ने चंडीगढ़ स्थित सेना की वेस्टर्न कमांड का दौरा किया। यह वही कमांड है जिसने पिछले साल ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान के आतंकी कैंपों पर कहर बरपाया था। आइए समझते हैं इस यात्रा के मायने और इस पर क्यों मचा है सियासी घमासान।”

न्यूज़ हेडलाइन्स (Main Highlights)

  • ऐतिहासिक दौरा: ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार किसी विदेशी डेलिगेशन को वेस्टर्न कमांड के मुख्यालय में ब्रीफिंग दी गई।
  • ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा: अमेरिकी अधिकारियों को पाकिस्तान सीमा की वर्तमान स्थिति और पिछले साल की सैन्य कार्रवाई के ‘टैक्टिकल एग्जीक्यूशन’ के बारे में विस्तार से बताया गया।
  • विपक्ष के सवाल: कांग्रेस और प्रियंका चतुर्वेदी जैसे विपक्षी नेताओं ने संवेदनशील सैन्य क्षेत्रों में अमेरिकी दखल पर सवाल उठाए हैं।
  • बड़ा कूटनीतिक संकेत: विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा भारत और अमेरिका के बीच गहरे होते रक्षा संबंधों और भरोसे का प्रतीक है।

ग्राउंड रिपोर्ट: क्यों खास है वेस्टर्न कमांड और यह यात्रा?

[रिपोर्टर वॉयसओवर]
चंडीगढ़ स्थित वेस्टर्न कमांड का मुख्यालय पाकिस्तान से सटी संवेदनशील सीमाओं (जम्मू-कश्मीर के अखनूर से लेकर पंजाब के फाजिल्का तक) की निगरानी करता है।

यात्रा की महत्वपूर्ण बातें:

  1. रणनीतिक ब्रीफिंग: लेफ्टिनेंट जनरल मनोज कुमार कटियार ने अमेरिकी डेलिगेशन को सीमा पर परिचालन तैयारियों (Operational Preparedness) और क्षेत्रीय स्थिरता में भारतीय सेना की भूमिका के बारे में जानकारी दी।
  2. अमेरिका का रुख: एडमिरल पापारो ने भारतीय सेना की कार्रवाई की तारीफ करते हुए कहा कि भारत-अमेरिका रक्षा संबंध अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर हैं।
  3. ट्रम्प प्रशासन का संदेश: डोनाल्ड ट्रम्प के करीबी माने जाने वाले सर्जियो गोर की मौजूदगी यह दर्शाती है कि अमेरिका अब दक्षिण एशिया में पाकिस्तान के मुकाबले भारत को कहीं अधिक तरजीह दे रहा है।

सियासी घमासान: विपक्ष की आपत्ति

राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने चिंता जताई कि भारत के रणनीतिक हित अब अमेरिकी उम्मीदों से जुड़ते जा रहे हैं। उन्होंने पिछले साल ट्रम्प द्वारा भारत-पाक संघर्ष विराम का श्रेय लेने का भी जिक्र किया। कांग्रेस ने भी पठानकोट एयरबेस का हवाला देते हुए संवेदनशील इलाकों में विदेशी अधिकारियों की पहुंच पर सवाल खड़े किए हैं।


विश्लेषण: क्या है इस यात्रा के पीछे का असली संदेश?

[डिप्लोमैटिक एक्सपर्ट व्यू]
इस यात्रा के पीछे तीन बड़े संदेश छिपे हैं:

  • चीन को काउंटर करना: अमेरिका, भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के खिलाफ सबसे मजबूत दीवार के रूप में देख रहा है।
  • रूस से दूरी: अमेरिका चाहता है कि भारत हथियारों के लिए रूस पर अपनी निर्भरता कम करे और अमेरिकी रक्षा तकनीक को अपनाए।
  • पाकिस्तान का घटता कद: अमेरिका की नई नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी (NSS) में पाकिस्तान का जिक्र न होना और भारत के सैन्य कमांड का दौरा करना यह बताता है कि वाशिंगटन के लिए अब इस्लामाबाद की अहमियत खत्म हो रही है।

निष्कर्ष

भले ही इस पर राजनीति हो रही हो, लेकिन वैश्विक स्तर पर यह भारत की सैन्य शक्ति की स्वीकार्यता का प्रमाण है। भारत अब रक्षा क्षेत्र में न केवल खरीदार है, बल्कि एक ऐसा रणनीतिक साझीदार है जिसके अनुभव से दुनिया की सबसे बड़ी सेना (अमेरिका) भी सीखना चाहती है।

[एंकर साइन-ऑफ]
“सीमा पर तैनात जवानों और दिल्ली में बैठे कूटनीतिज्ञों की यह जुगलबंदी भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जा रही है। न्यूज़ डेस्क से मैं [AI सहायक], कैमरामैन के साथ।”


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