मुख्य सुर्खियां:

  • IIT बॉम्बे के पूर्व छात्र का खुलासा: “मुंबई में UKG की फीस 4 लाख, मेरी पूरी इंजीनियरिंग इससे आधी कीमत में हुई।”
  • शिक्षा या ‘हिडन इन्फ्लेशन’? किंडरगार्टन की फीस ने तोड़े सारे रिकॉर्ड, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस।
  • स्टेटस सिंबल या मजबूरी? मध्यम वर्ग पर भारी पड़ रही प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस।
  • AI ट्यूटर्स और होमस्कूलिंग पर चर्चा: क्या तकनीक कम करेगी पढ़ाई का बढ़ता खर्च?

विस्तृत समाचार रिपोर्ट:

मुंबई: शिक्षा के नाम पर बढ़ती महंगाई का संकट

मुंबई में रहने वाले IIT बॉम्बे के एक पूर्व छात्र, अविरल भटनागर के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने इंटरनेट पर तहलका मचा दिया है। अविरल ने अपने पोस्ट में बताया कि उनकी भतीजी की अपर किंडरगार्टन (UKG) की सालाना फीस मुंबई में 4 लाख रुपये को पार कर गई है। उन्होंने इसकी तुलना अपने समय की फीस से करते हुए कहा कि IIT बॉम्बे से उनकी चार साल की पूरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई इस राशि की आधी कीमत में हो गई थी।

सोशल मीडिया पर बंटा जनमत
अविरल के इस पोस्ट पर हजारों लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। बहस इस बात पर छिड़ गई है कि क्या यह वास्तव में महंगाई है या केवल अमीरों का ‘लाइफस्टाइल चॉइस’। एक यूजर ने लिखा, “यह शिक्षा की महंगाई नहीं, बल्कि स्टेटस की दौड़ है। जब लोगों के पास पैसा आता है, तो वे सस्ते विकल्पों को नहीं चुनते।” वहीं एक अन्य यूजर ने कहा, “भारत में शिक्षा, शादी और इलाज सबसे बड़े बिजनेस बन चुके हैं। सरकारी संस्थानों की खराब हालत ही प्राइवेट स्कूलों को मनमानी का मौका देती है।”

अभिभावकों का दर्द
नोएडा के एक अभिभावक ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी 4 साल की बेटी का दाखिला एक अच्छे स्कूल में कराया है जिसकी फीस 2.75 लाख रुपये सालाना है। कई लोगों का मानना है कि अब शिक्षा ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ (ROI) के लिहाज से घाटे का सौदा साबित हो रही है, क्योंकि पढ़ाई पर लाखों खर्च करने के बाद भी वैसी नौकरियां नहीं मिल रही हैं।

भविष्य का विकल्प: AI और होमस्कूलिंग
इस बहस के बीच कई लोगों ने तकनीक को समाधान के रूप में देखा। अविरल भटनागर ने भी सुझाव दिया कि शायद भविष्य में AI ट्यूटर्स शिक्षा को फिर से सस्ता और सुलभ बना दें। वहीं कुछ लोगों ने ‘होमस्कूलिंग’ (घर पर पढ़ाई) को एक बेहतर विकल्प बताया ताकि स्कूलों की लूट से बचा जा सके।

निष्कर्ष:
यह मामला केवल एक स्कूल की फीस का नहीं है, बल्कि भारत के शिक्षा ढांचे में बढ़ती खाई को दर्शाता है। जहाँ शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, वहीं निजी स्कूलों का इसे मुनाफा कमाने का जरिया बनाना मध्यम वर्ग के लिए चिंता का विषय बन गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *