पश्चिमी देशों में लोकप्रिय को-पैरेंटिंग व्यवस्था, भारत में चुनौतियाँ और संभावनाएँ

नई दिल्ली। तलाक के बाद बच्चों की परवरिश सबसे बड़ी चिंता होती है। आमतौर पर बच्चों को माता-पिता के अलग-अलग घरों में समय बिताना पड़ता है, जिससे उनकी दिनचर्या और भावनात्मक स्थिरता प्रभावित होती है। इसी समस्या का समाधान पश्चिमी देशों में ‘Nesting’ मॉडल के रूप में सामने आया है।

क्या है Nesting?

  • इसमें बच्चे अपने परिवार के घर में ही रहते हैं।
  • माता-पिता बारी-बारी से उसी घर में आते-जाते हैं और बच्चों की देखभाल करते हैं।
  • बच्चों को बार-बार घर बदलने की ज़रूरत नहीं पड़ती, जिससे उनकी दिनचर्या और भावनात्मक सुरक्षा बनी रहती है।

फायदे

  • बच्चों को निरंतरता और स्थिरता मिलती है।
  • वही स्कूल, वही पड़ोस, वही दोस्त और परिचित माहौल उन्हें सुरक्षित महसूस कराता है।
  • छोटे बच्चों के लिए यह मॉडल अधिक आरामदायक साबित हो सकता है।

चुनौतियाँ

  • कपल्स के बीच सम्मानजनक और शांतिपूर्ण संबंध होना ज़रूरी है।
  • अगर रिश्ते में कड़वाहट या झगड़े हों, तो Nesting असंभव है।
  • साझा घर में रहना, खर्च और जिम्मेदारियों का बंटवारा भावनात्मक रूप से थकाने वाला हो सकता है।
  • लंबे समय तक यह मॉडल टिकाऊ नहीं होता, खासकर जब नए रिश्ते या आर्थिक दबाव सामने आते हैं।

भारत में संभावनाएँ

  • भारतीय समाज में तलाक अब भी कलंक माना जाता है, खासकर महिलाओं के लिए।
  • संयुक्त परिवारों की परंपरा और निजी जीवन में हस्तक्षेप Nesting को और कठिन बना देती है।
  • कानूनी रूप से Nesting पर कोई रोक नहीं है। अदालतें हमेशा बच्चे के हित और कल्याण को प्राथमिकता देती हैं।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल भारत में केवल अस्थायी व्यवस्था के रूप में ही काम कर सकता है।

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