धारावी की गलियों में सिर्फ चमड़े का कारोबार ही नहीं, बल्कि मुंबई की भूख मिटाने वाला ‘इडली-कॉफी’ नेटवर्क और शहर को साफ रखने वाला ‘रिसाइकिलिंग’ सिस्टम भी यहीं से चलता है। 1. इडली-कॉफी का ‘हब’: सुबह 2:30 बजे से शुरू होता है काम मुंबई की सड़कों पर साइकिल पर इडली-वड़ा बेचने वाले अधिकांश वेंडर्स का सप्लाई चेन ‘धारावी’ से जुड़ा है। दक्षिण भारतीय विरासत: मूल रूप से तमिल बस्ती होने के कारण यहाँ तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के लोग इडली और फिल्टर कॉफी का थोक व्यापार करते हैं। सप्लाई चेन: शनाप्पा जैसे कारीगर रात 2:30 बजे से इडली बनाना शुरू करते हैं। एक बैच में 120 इडली बनती हैं और सुबह 5 बजे तक सारा स्टॉक बिक जाता है। पूरे मुंबई में पैठ: यहाँ से तैयार नाश्ता बांद्रा से लेकर कांदिवली तक के दफ्तरों और कॉलेजों के बाहर पहुँचता है। सुबह की चाय-कॉफी की महक यहाँ की गलियों की दुर्गंध को कुछ देर के लिए कम कर देती है। 2. मुंबई के ‘सफाई वीर’: कचरे का 80% रिसाइकिलिंग धारावी के कबाड़ी और स्क्रैप डीलर मुंबई के ‘अनसंग हीरोज’ (Unsung Heroes) हैं। अविश्वसनीय क्षमता: मुंबई के कुल ठोस कचरे (करीब 20,000 टन प्रतिदिन) का 80% हिस्सा धारावी में प्रोसेस किया जाता है। लगभग 2.5 लाख कचरा बीनने वाले और डीलर इसमें शामिल हैं। जोखिम भरा काम: वकील आलम जैसे स्क्रैप डीलर बताते हैं कि उनके लड़के बिना किसी सुरक्षा उपकरण (ग्लव्स या बूट्स) के मेडिकल वेस्ट, ई-वेस्ट और नुकीली धातुओं को नंगे हाथों से छांटते हैं। छत पर रिसाइकिलिंग: प्लास्टिक को रंग और घनत्व के आधार पर छांटा जाता है, धोया जाता है और झुग्गियों की छतों पर सुखाया जाता है। इसी प्लास्टिक से बाद में नए पाइप और बैग बनाए जाते हैं। United Nations Human Settlements Programme 3. ‘मिट्टी’ का व्यवसाय और स्वास्थ्य की चुनौती धारावी में मिट्टी के बर्तनों (Clay Business) का काम भी बड़े पैमाने पर होता है, लेकिन इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। स्वास्थ्य संकट: झुग्गियों के भीतर बनी भट्टियों से निकलने वाला धुआं सीधे फेफड़ों में जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यहाँ कैंसर की दर हर साल बढ़ रही है। यदि इस क्षेत्र को औपचारिक रूप दिया जाए, तो सैकड़ों परिवारों का अस्पताल का खर्च बच सकता है। पुनर्विकास और ‘मैनहट्टन’ बनने का डर धारावी में अब पुनर्विकास की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन निवासियों के मन में एक गहरा डर है: विस्थापन की चिंता: अगस्त 2025 की ‘इंडिया टुडे’ रिपोर्ट के अनुसार, निवासियों को डर है कि इस प्रोजेक्ट को ‘पुनर्वास’ के बजाय ‘रियल एस्टेट स्कीम’ की तरह देखा जा रहा है। पात्रता का संकट: बहुत से लोग जो यहाँ छोटे-छोटे रोजगारों से जुड़े हैं, उन्हें डर है कि वे ‘मैनहट्टन’ जैसी दिखने वाली नई इमारतों में रहने के लिए “अपात्र” घोषित कर दिए जाएंगे। वकील आलम कहते हैं, “नई बिल्डिंग बन सकती है, लेकिन धारावी की फितरत नहीं बदल सकती। यहाँ खूंटा गाड़ना मुश्किल है।” निष्कर्ष: धारावी की गंदगी के पीछे एक ऐसा इकोसिस्टम है जो मुंबई को खिलाता भी है और साफ भी रखता है। जैसा कि प्लंबर हनुमंता ने कहा था, यह वाकई “सोने का गटर” है, जिसने अपनी मेहनत से एक अरब डॉलर का साम्राज्य खड़ा किया है। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation भारत में पेटेंट का ‘धमाका’: प्राइवेट यूनिवर्सिटीज ने IIT को भी छोड़ा पीछे, लेकिन क्या यह असली इनोवेशन है या सिर्फ रैंकिंग का खेल? “जो गुरु को नहीं मानते, वे ‘रास्कल’ और ‘बर्बर’ हैं”: मद्रास हाईकोर्ट के जज जी.आर. स्वामीनाथन के बयान से नया विवाद