लखनऊ/बरेली:
उत्तर प्रदेश में ‘I Love Muhammad’ पोस्टरों से शुरू हुआ विवाद अब महज एक कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसने एक बड़े सियासी संग्राम का रूप ले लिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस विवाद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को हिंदुत्व के एजेंडे को धार देने का नया मौका दे दिया है, जबकि समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव इस पर चुप्पी साधने को मजबूर हैं।

कैसे बना यह ‘सियासी हथियार’?

  1. हिंदुत्व की लामबंदी: नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान इस विवाद के बढ़ने से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कड़ा रुख अपनाने का मौका मिला। उन्होंने बरेली के मुख्य आरोपी मौलाना तौकीर रजा के खिलाफ “सबक सिखाने” वाला बयान देकर साफ कर दिया कि त्योहारों के बीच शांति भंग करने वालों से सख्ती से निपटा जाएगा।
  2. सपा के लिए ‘PDA’ का संकट: अखिलेश यादव पिछले कई महीनों से ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं। लेकिन इस विवाद ने इसे ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ की डिबेट में बदल दिया है। अगर अखिलेश खुलकर समर्थन करते हैं तो बहुसंख्यक वोट बैंक खिसकने का डर है, और अगर चुप रहते हैं तो अल्पसंख्यक आधार नाराज हो सकता है।

सपा नेताओं की बयानबाजी ने बढ़ाई मुश्किलें
सपा के लिए स्थिति तब और असहज हो गई जब पार्टी प्रवक्ता सुमैय्या राणा ने बरेली के समर्थन में लखनऊ में बड़े आंदोलन की चेतावनी दे दी। पार्टी को तुरंत उनसे स्पष्टीकरण मांगना पड़ा। इसके अलावा, कानपुर विवाद के मुख्य आरोपी जुबैर अहमद खान, जो एक बर्खास्त सिपाही है, उसका हाल ही में सपा में शामिल होना भी बीजेपी को हमला करने का मौका दे रहा है।

** ideological contest (वैचारिक जंग)**
मुख्यमंत्री योगी ने इस पूरे मुद्दे को ‘धार्मिक कट्टरवाद बनाम हिंदुत्व’ के रूप में पेश किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बीजेपी इस मुद्दे को तब तक गरमाए रख सकती है जब तक उसे चुनावी लाभ न मिल जाए। वहीं, अखिलेश यादव उम्मीद कर रहे हैं कि यह विवाद जल्द ही शांत हो जाए ताकि उनकी सोशल इंजीनियरिंग का गणित न बिगड़े।

निष्कर्ष:
बरेली से शुरू हुई यह चिंगारी अब यूपी की राजनीति में एक बड़ी लकीर खींच चुकी है। एक तरफ ‘सख्त प्रशासन’ की छवि है, तो दूसरी तरफ ‘सावधानी भरी चुप्पी’।


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