गांधीनगर: गुजरात सरकार ने विवाह पंजीकरण के नियमों में एक बड़ा और विवादित बदलाव प्रस्तावित किया है। नए प्रस्ताव के अनुसार, अब राज्य में प्रेम विवाह (Love Marriage) करने वाले जोड़ों के लिए अपने माता-पिता को सूचित करना और पंजीकरण प्रक्रिया में उनकी जानकारी देना अनिवार्य हो सकता है। सरकार का कहना है कि यह कदम ‘लव जिहाद’ और धोखाधड़ी से होने वाली शादियों को रोकने के लिए उठाया जा रहा है।

प्रस्तावित बदलावों के मुख्य बिंदु

गुजरात मैरिज रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत प्रस्तावित ड्राफ्ट में निम्नलिखित नियम शामिल हैं:

  • घोषणा पत्र: शादी के आवेदन के साथ दूल्हा-दुल्हन को यह बताना होगा कि उन्होंने अपने माता-पिता को सूचित किया है या नहीं। Gujarat Government Official Portal
  • अभिभावकों को नोटिस: आवेदन मिलने के 10 दिनों के भीतर सहायक रजिस्ट्रार दोनों पक्षों के माता-पिता को आधिकारिक नोटिस भेजकर सूचित करेगा।
  • अनिवार्य विवरण: आवेदकों को अपने माता-पिता के नाम, पते, आधार कार्ड और संपर्क विवरण देने होंगे।
  • 30 दिन की प्रतीक्षा: सभी सत्यापन के बाद 30 दिनों के भीतर विवाह प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा। Health & Family Welfare Dept, Gujarat

सरकार का तर्क: “धोखे वाले प्यार के खिलाफ कार्रवाई”

गृह मंत्री हर्ष संघवी ने विधानसभा में कहा कि सरकार “प्यार के खिलाफ नहीं है”, लेकिन उन लोगों के खिलाफ सख्त है जो “धोखे से प्यार को बदनाम” करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मासूम लड़कियों को जाल में फंसाया जा रहा है और यह समस्या “दीमक की तरह” समाज में फैल रही है। Home Department, Gujarat

सुप्रीम कोर्ट और ‘हादिया केस’ का हवाला

आलोचकों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया है। सोशल मीडिया पर लोग 2018 के ऐतिहासिक हादिया मामले का हवाला दे रहे हैं:

  1. व्यक्तिगत स्वायत्तता: सुप्रीम कोर्ट ने हादिया मामले में स्पष्ट किया था कि दो वयस्कों (Adults) को अपना जीवनसाथी चुनने का मौलिक अधिकार है और इसमें राज्य या माता-पिता हस्तक्षेप नहीं कर सकते। Supreme Court of India
  2. अनुच्छेद 21: जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा था कि “अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 का अभिन्न अंग है।”
  3. निजता का अधिकार: कोर्ट ने माना था कि शादी जैसे निजी फैसले राज्य के नियंत्रण से बाहर हैं और माता-पिता की असहमति किसी वयस्क के मौलिक अधिकारों को कम नहीं कर सकती।

अगला कदम: गुजरात सरकार ने इन नियमों पर जनता से 30 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं। इसके बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये नियम लागू होते हैं, तो इन्हें अदालत में चुनौती दी जा सकती है।


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