नई दिल्ली: साल 2024-25 भारत के लिए बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ है। भारत ने पहली बार 1 लाख पेटेंट फाइलिंग का आंकड़ा पार कर लिया है। लेकिन इस सुनहरे आंकड़े के पीछे एक चौंकाने वाली सच्चाई छिपी है—देश के प्रतिष्ठित IITs के मुकाबले निजी विश्वविद्यालय (Private Universities) कहीं अधिक पेटेंट फाइल कर रहे हैं। आंकड़ों का गणित: निजी विश्वविद्यालयों का दबदबा पेटेंट कार्यालय की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, ‘शैक्षणिक संस्थानों’ की श्रेणी में पेटेंट फाइलिंग में 62% का जबरदस्त उछाल देखा गया है। टॉप 10 आवेदकों की सूची में 9 संस्थान निजी या डीम्ड यूनिवर्सिटीज हैं। यहाँ तक कि सभी IITs मिलकर भी संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर हैं, पहले पर नहीं। पेटेंट ‘फाइल’ करना बनाम ‘ग्रांट’ होना: असली अंतर यहाँ है विशेषज्ञों का कहना है कि पेटेंट फाइल करने और उसे आधिकारिक रूप से प्राप्त (Grant) करने में जमीन-आसमान का अंतर है: फाइलिंग (Filing): यह केवल एक आवेदन प्रक्रिया है। कोई भी संस्थान मामूली फीस देकर अपने किसी भी विचार को पेटेंट के लिए फाइल कर सकता है। ग्रांट (Grant): यह तब होता है जब सरकारी जांच में आपका आविष्कार ‘अनोखा’ और ‘उपयोगी’ पाया जाता है। हकीकत: आंकड़ों से पता चलता है कि कई निजी संस्थान हजारों पेटेंट फाइल तो कर रहे हैं, लेकिन उनमें से ग्रांट होने की दर (Success Rate) बेहद कम या शून्य है। Indian Patent Office Report क्यों मची है पेटेंट फाइल करने की होड़? आखिर निजी विश्वविद्यालय इतने बड़े पैमाने पर पेटेंट क्यों फाइल कर रहे हैं? इसके पीछे तीन मुख्य कारण सामने आए हैं: NIRF रैंकिंग का ‘गेम’: भारत सरकार की रैंकिंग प्रणाली (NIRF) में ‘अनुसंधान और पेशेवर अभ्यास’ के लिए अंक दिए जाते हैं। संस्थान जानते हैं कि रैंकिंग में ऊपर चढ़ने का सबसे तेज़ तरीका भारी मात्रा में पेटेंट फाइल करना है। NIRF Rankings प्रमोशन और इंसेंटिव: कई निजी यूनिवर्सिटीज अपने फैकल्टी को हर पेटेंट पब्लिश होने पर ₹5,000 से ₹15,000 तक का नकद इनाम और प्रमोशन का लालच देती हैं। इससे शिक्षकों पर गुणवत्ता के बजाय संख्या बढ़ाने का दबाव रहता है। मार्केटिंग और Prestige: एडमिशन के समय चमकदार ब्रोशर में “1000+ पेटेंट फाइल किए” लिखना छात्रों और अभिभावकों को प्रभावित करने का एक आसान तरीका बन गया है। क्या इससे देश को फायदा हो रहा है? एक बड़े पेटेंट बेस का मतलब आमतौर पर आर्थिक प्रगति होता है, लेकिन यहाँ मामला अलग है। कमर्शियलाइजेशन का अभाव: IIT जैसे संस्थानों के पेटेंट अक्सर कंपनियों को बेचे जाते हैं या उनसे स्टार्टअप बनते हैं। इसके विपरीत, निजी विश्वविद्यालयों के अधिकांश पेटेंट केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं। टैक्सपेयर्स के पैसे का नुकसान: विशेषज्ञ अचल अग्रवाल का सुझाव है कि सरकार को केवल उन पेटेंटों की फीस प्रतिपूर्ति (Reimbursement) करनी चाहिए जो ‘ग्रांट’ हो जाते हैं, ताकि बेकार के आवेदनों की बाढ़ को रोका जा सके। Department for Promotion of Industry and Internal Trade निष्कर्ष: भारत का 1 लाख पेटेंट का आंकड़ा पार करना गर्व की बात है, लेकिन अगर ये पेटेंट असल दुनिया की समस्याओं को हल नहीं कर रहे या नौकरियां पैदा नहीं कर रहे, तो यह केवल एक ‘नंबर गेम’ बनकर रह जाएगा। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation “जो मोदी को गाली देंगे, उन्हें कंबल नहीं मिलेगा”: बीजेपी नेता ने मुस्लिम महिलाओं से वापस छीने कंबल, वीडियो वायरल भारत में पेटेंट का ‘धमाका’: प्राइवेट यूनिवर्सिटीज ने IIT को भी छोड़ा पीछे, लेकिन क्या यह असली इनोवेशन है या सिर्फ रैंकिंग का खेल?