सऊदी अरब ने एलान किया है कि वह देश के लाखों ऊंटों को पासपोर्ट जारी कर रहा है. अधिकारियों का कहना है कि इस क़दम से देश के इन क़ीमती जानवरों को बेहतर तरीक़े से पालने में मदद मिलेगी. सऊदी अधिकारियों के अनुसार इस क़दम से ऊंट पालन के फ़ायदे बढ़ेंगे. साथ ही जानवरों की पहचान और उनके मालिकों के बारे में एक भरोसेमंद डेटाबेस तैयार होगा. पर्यावरण, जल और कृषि मंत्रालय की तरफ से सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में इससे जुड़े दस्तावेज़ भी दिखाए गए हैं. इसमें एक हरा पासपोर्ट दिखाया गया है जिस पर देश का ‘कोट ऑफ़ आर्म्स’ (राजचिह्न) और ऊंट की सुनहरी मुहर है.ऊंट सऊदी अरब के राष्ट्रीय प्रतीक का हिस्सा है. देश में ऊंटों की सौंदर्य प्रतियोगिताएं और शो भी आयोजित किए जाते हैं, जहां बेहतरीन ऊंटों को इनामों से नवाज़ा जाता है. राष्ट्रीय दिवसों, विशेष और ऐतिहासिक अवसरों पर सऊदी अरब की प्रदर्शनी ऊंटों के बिना अधूरी मानी जाती है. सऊदी अरब और अरब खाड़ी देशों में ऊंटों की भूमिका का एक लंबा इतिहास रहा है.टों का इतिहास अगर हम संक्षिप्त इतिहास पर नज़र डालें तो हमें बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों की ऐसी तस्वीरें मिलती हैं जिनमें दिखाया गया है कि ऊंट इस्लाम धर्म के पवित्र शहरों मक्का और मदीना के सफ़र के लिए अकेला ज़रिया था. अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और यहां तक कि सुदूर पूर्व से धार्मिक यात्रा पर निकले लोगों के क़ाफ़िले ऊंटों पर लंबे सफ़र के बाद सऊदी अरब पहुंचते थे. खाड़ी के बंजर रेगिस्तानों में आने-जाने के लिए ऊंटों के इस्तेमाल की परंपरा सदियों पुरानी है. एक शोध से पता चला है कि सऊदी अरब में पत्थरों पर उकेरी गई ऊंटों की मूर्तियां दुनिया में जानवरों की सबसे पुरानी तस्वीरें हो सकती हैं. जब साल 2018 में पहली बार उन जगहों में खुदाई की गई तो शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि पत्थरों पर उकेरी गईं ये तस्वीरें लगभग दो हज़ार साल पहले बनाई गई होंगी. ऐसा अनुमान इसलिए लगाया कि पत्थरों पर उकेरी गईं यह तस्वीरें जॉर्डन के मशहूर प्राचीन शहर पेट्रा में पाए गए पुरावशेषों से मिलती जुलती थीं. हालांकि बाद के शोध में ऊंटों की इन तस्वीरों की उम्र सात हज़ार से आठ हज़ार साल बताई गई. पत्थरों पर की गई नक़्क़ाशी की सही उम्र तय करना शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी चुनौती रही है क्योंकि गुफा चित्रों के विपरीत इन नमूनों में अक्सर कोई जैविक सामग्री नहीं होती है. इस क्षेत्र में इस स्तर का ‘रॉक आर्ट’ मिलना भी दुर्लभ है. सितंबर 2021 में अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की एक टीम ने अपने नतीजे ‘जर्नल ऑफ़ आर्कियोलॉजिकल साइंस’ में प्रकाशित किए. उन्होंने मूर्तियों की नई तारीख़ तय करने के लिए क्षेत्र में पाए गए क्षरण के पैटर्न, निशानों और जानवरों की हड्डियों का विश्लेषण किया. ऐसे स्मारक पाषाण युग से भी पुराने बताए जाते हैं जो पाँच हज़ार साल तक प्राचीन हो सकते हैं. यह मिस्र के गीज़ा पिरामिडों से भी पुराने हो सकते हैं जो साढ़े चार हज़ार साल प्राचीन हैं. ऐसे स्मारक ऊंटों को पालतू जानवर के तौर पर रखने से पहले ही बनाए गए थे जो इस क्षेत्र के आर्थिक विकास की एक अहम पहचान थे जब यह मूर्तियां बनाई गई थीं उस वक़्त का सऊदी अरब आज से बिल्कुल अलग था. आज के रेगिस्तानों के बजाय वहां झीलों के साथ बहुत हरियाली और घास वाले क्षेत्र थे. अभी तक यह साफ़ नहीं है कि ऊंटों की ये मूर्तियां क्यों बनाई गई थीं, लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि यह ख़ानाबदोश क़बीलों के मिलने की जगह रही होगी. FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation “सुनीता विलियम्स का संकल्प – गुजरात के पैतृक गांव जाना ही होगा” “प्रिंस विलियम की सऊदी यात्रा और मोहम्मद बिन सलमान से मुलाक़ात पर उठे सवाल”