नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट एक ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रहा है जिसमें उन चुनावों में भी NOTA को अनिवार्य बनाने की मांग की गई है जहाँ केवल एक ही उम्मीदवार मैदान में हो। सुनवाई के दौरान अदालत ने मतदाता भागीदारी और NOTA की प्रभावशीलता के सामाजिक पहलुओं पर चर्चा की।

अदालत की मुख्य टिप्पणियां:

  • नेताओं की गुणवत्ता पर सवाल: जस्टिस जोयमाल्या बागची ने टिप्पणी की, “क्या NOTA के आने से चुने गए नेताओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ है? आंकड़े बताते हैं कि शिक्षित और संपन्न लोग कम मतदान करते हैं, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग अधिक मतदान करता है।” Business Today
  • मतदान के प्रति उदासीनता: कोर्ट ने नोट किया कि NOTA उपलब्ध होने के बावजूद, शिक्षित और अमीर वर्गों में मतदान के प्रति उदासीनता (Voter Apathy) अधिक देखी गई है।
  • अनिवार्य मतदान का सुझाव: CJI सूर्य कांत ने कहा कि मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए कुछ “अनिवार्य लेकिन नरम” तंत्र (Mechanism) की आवश्यकता हो सकती है, जो दंडात्मक न हो। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं का उदाहरण दिया जो समूह में गाते हुए उत्साह के साथ वोट डालने जाती हैं। Hindustan Times
  • महिलाओं की बढ़ती भूमिका: जस्टिस बागची ने रेखांकित किया कि विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में महिला मतदाताओं की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है।

NOTA विकल्प के बारे में मुख्य तथ्य:

  • शुरुआत: सुप्रीम कोर्ट के 2013 के एक फैसले के बाद EVM में NOTA को शामिल किया गया था।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य मतदाताओं की गोपनीयता बनाए रखना और उन्हें सभी उम्मीदवारों को औपचारिक रूप से खारिज करने का अधिकार देना था।
  • वर्तमान स्थिति: हालांकि यह एक प्रतीकात्मक विकल्प है। अगर किसी चुनाव में NOTA को सबसे अधिक वोट मिलते हैं, तो भी दूसरे नंबर पर रहने वाले उम्मीदवार को ही विजेता घोषित किया जाता है। कोर्ट ने अब तक इस आधार पर ‘पुनर्मतदान’ (Re-election) का आदेश देने से इनकार किया है। Economic Times

निष्कर्ष: अदालत अब इस बात की जांच कर रही है कि क्या NOTA के दायरे को बढ़ाने से चुनावी भागीदारी या निर्वाचित नेतृत्व की गुणवत्ता पर कोई सार्थक प्रभाव पड़ेगा।

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