नई दिल्ली: खगोल विज्ञान के अनुसार, ग्रहण कभी अकेले नहीं आते; वे हमेशा जोड़ों (Pairs) में आते हैं। इस अवधि को ‘ग्रहण सीजन’ (Eclipse Season) कहा जाता है, जो हर छह महीने में एक बार आता है। इसके पीछे का मुख्य विज्ञान: चंद्रमा की झुकी हुई कक्षा (Tilted Orbit): पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की कक्षा एकदम सीधी नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की कक्षा के सापेक्ष लगभग 5 डिग्री झुकी हुई है। इसे आप दो एक-दूसरे में फंसे हूला-हूप्स (Hula-hoops) की तरह समझ सकते हैं, जिनमें से एक थोड़ा तिरछा है। नोड्स (Nodes) का खेल: झुकाव के कारण चंद्रमा अक्सर पृथ्वी की छाया के ऊपर या नीचे से निकल जाता है। लेकिन साल में दो बार ऐसा समय आता है जब चंद्रमा की कक्षा और पृथ्वी की कक्षा एक-दूसरे को काटती हैं। इन मिलन बिंदुओं को ‘नोड्स’ कहा जाता है। Business Today 14 दिनों का चक्र: सूर्य ग्रहण: जब चंद्रमा अपने ‘न्यू मून’ (अमावस्या) चरण में पहले नोड पर पहुँचता है, तो वह सूर्य की रोशनी को रोकता है, जिससे सूर्य ग्रहण होता है। चंद्र ग्रहण: चंद्रमा को अपनी कक्षा के दूसरी तरफ पहुँचने में ठीक 14 दिन लगते हैं। 14 दिन बाद, जब चंद्रमा ‘फुल मून’ (पूर्णिमा) चरण में होता है, वह स्वाभाविक रूप से दूसरे नोड से टकराता है। इस समय पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और अपनी छाया चंद्रमा पर डालती है, जिससे चंद्र ग्रहण होता है। ग्रहण सीजन (Eclipse Season) क्या है? ग्रहण सीजन लगभग 34 दिनों की एक खिड़की होती है जहाँ सूर्य, पृथ्वी और नोड्स पूरी तरह से एक सीध में होते हैं। इसे एक ‘ब्रह्मांडीय सी-सॉ’ (Cosmic Seesaw) की तरह समझें। यदि चंद्रमा सीजन की शुरुआत सूर्य ग्रहण से करता है, तो उसके पास इतना समय होता है कि वह दो सप्ताह बाद घूमकर पृथ्वी की छाया में आ जाए। Science Daily निष्कर्ष: अगर ये ‘नोड्स’ नहीं होते, तो चंद्रमा अपने झुके हुए रास्ते पर ही रहता और कभी भी पृथ्वी या सूर्य की छाया के साथ सटीक संरेखण (Alignment) नहीं बना पाता। इसीलिए, जब भी ब्रह्मांड का ‘दरवाजा’ (नोड) खुलता है, तो हमें दो सप्ताह के अंतराल पर ये दोनों अद्भुत नजारे देखने को मिलते हैं। अगली तारीख: 3 मार्च 2026 (पूर्ण चंद्र ग्रहण)। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation शिखर धवन की कानूनी जीत: कोर्ट ने पूर्व पत्नी को ₹5.7 करोड़ लौटाने का दिया आदेश; ‘जबरन वसूली और धोखाधड़ी’ को बताया कारण पेड़ों पर दिखी ‘बिजली की चमक’: 100 साल पुराने सिद्धांत को वैज्ञानिकों ने किया साबित