नई दिल्ली/वाशिंगटन: भारत और अमेरिका के बीच होने वाली महत्वपूर्ण व्यापार वार्ता (Trade Talks) अचानक रुक गई है। 23-24 फरवरी 2026 को होने वाली इस बैठक के लिए भारतीय वार्ताकारों के वाशिंगटन जाने का कार्यक्रम था, जिसे अंतिम समय में रद्द कर दिया गया। यह केवल एक तकनीकी स्थगन नहीं, बल्कि भारत की एक ‘सोची-समझी रणनीति’ है।

क्या है मुख्य कारण?

इस स्थगन के पीछे अमेरिका में हुआ एक बड़ा कानूनी बदलाव है:

  1. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला: हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक 6-3 के फैसले में राष्ट्रपति के टैरिफ (शुल्क) लगाने के अधिकारों को सीमित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (IEEPA) के तहत राष्ट्रपति को अपनी मर्जी से टैरिफ थोपने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार केवल अमेरिकी संसद (Congress) के पास है।
  2. ट्रम्प सरकार का नया दांव: सुप्रीम कोर्ट के झटके के बाद, ट्रम्प प्रशासन ने आनन-फानन में 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 का इस्तेमाल किया। इसके तहत राष्ट्रपति 150 दिनों के लिए 15 प्रतिशत का “अस्थाई वैश्विक टैरिफ” लगा सकते हैं।

भारत के लिए क्या बदली स्थिति?

भारत और अमेरिका जिस अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Deal) पर काम कर रहे थे, उसकी बुनियाद ही बदल गई है:

  • अनिश्चितता: समझौते का मसौदा पुराने टैरिफ ढांचे पर आधारित था। अब जब अमेरिका ने 15% का नया एक समान शुल्क लगा दिया है, तो पुराने आंकड़ों का कोई महत्व नहीं रह गया है।
  • GSP का मुद्दा: भारत अपने उत्पादों के लिए ‘जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रिफरेंस’ (GSP) का दर्जा बहाल कराना चाहता था। लेकिन अमेरिकी कार्यकारी शाखा (Executive) की शक्तियां कम होने से अब यह समझौता कानूनी रूप से कमजोर हो सकता है।
  • ‘वेट एंड वॉच’ की नीति: भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि 150 दिनों के बाद अमेरिकी संसद इस 15% शुल्क को आगे बढ़ाएगी या खत्म करेगी, तब तक बातचीत करना व्यर्थ है।

रणनीतिक सब्र (Strategic Patience)

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब ‘अपर हैंड’ (मजबूत स्थिति) में है:

  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राष्ट्रपति के पास सौदेबाजी की ताकत कम हुई है।
  • भारत का अमेरिका को निर्यात पिछले साल 6.8% बढ़कर 86 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। ऐसे में भारत को जल्दबाजी में कोई ऐसा समझौता करने की जरूरत नहीं है जो भविष्य में अमेरिकी अदालतों या संसद द्वारा रद्द किया जा सके।
  • भारत अपने स्टील, एल्युमीनियम और ऑटो-पार्ट्स निर्यातकों के हितों की रक्षा करना चाहता है, जो लंबे समय से अमेरिकी शुल्कों का सामना कर रहे हैं।

आगे क्या होगा?

दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत हैं, लेकिन भारत अब ‘राजनीतिक प्रतीकात्मकता’ के बजाय ‘कानूनी स्पष्टता’ चाहता है। यदि 150 दिनों के बाद अमेरिकी संसद इन शुल्कों पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर देती है, तो वार्ता फिर से शुरू हो सकती है। फिलहाल, नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया है कि वह जल्दबाजी में कोई कमजोर डील नहीं करेगा।


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