नई दिल्ली/तेहरान: ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने भारत के केंद्रीय बजट में चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिए कोई फंड आवंटित न किए जाने पर गहरी निराशा व्यक्त की है। ‘इंडिया टुडे’ को दिए एक विशेष साक्षात्कार में अरागची ने कहा कि यह निर्णय न केवल ईरान के लिए बल्कि भारत के लिए भी एक बड़ा झटका है। ‘भारत और मध्य एशिया के बीच की कड़ी’ईरानी विदेश मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने बयान को याद करते हुए चाबहार को एक “गोल्डन गेट” (सुनहरा प्रवेश द्वार) बताया। उन्होंने कहा, “चाबहार एक अत्यंत रणनीतिक बंदरगाह है जो हिंद महासागर क्षेत्र को मध्य एशिया, काकेशस और यूरोप से जोड़ता है। इसका पूर्ण विकास भारत की व्यापारिक पहुंच को पूरी दुनिया में बदल सकता है।” बजट में पहली बार नहीं मिला फंडसाल 2024 में बंदरगाह के संचालन के लिए 10 साल के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद यह पहला मौका है जब भारत ने बजट में इसके लिए कोई राशि नहीं रखी है। पिछले वर्षों में, भारत इस परियोजना के लिए सालाना लगभग 100 करोड़ रुपये आवंटित करता आ रहा था। क्या है इसके पीछे की वजह?विशेषज्ञों का मानना है कि इस कटौती के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और संभावित प्रतिबंधों का दबाव हो सकता है। अमेरिकी प्रतिबंध: अमेरिका द्वारा भारत को दी गई छह महीने की विशेष छूट (Waiver) 26 अप्रैल को समाप्त हो रही है। भारत का रुख: भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हाल ही में कहा था कि भारत इस मुद्दे पर वाशिंगटन के साथ लगातार संपर्क में है। भारत के लिए चाबहार क्यों है खास? पाकिस्तान को बायपास: यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान से गुजरे बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच प्रदान करता है। चीन को टक्कर: यह पाकिस्तान के ‘ग्वादर पोर्ट’ (चीन द्वारा विकसित) के जवाब में भारत की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मौजूदगी है। व्यापार में तेजी: इसके माध्यम से भारत से यूरोप तक माल भेजने का समय और लागत काफी कम हो जाएगी। ईरानी मंत्री ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में दोनों देश मिलकर इस बाधा को दूर करेंगे और चाबहार के पूर्ण विकास का सपना सच होगा। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation कोडावा शादी: कूर्ग की योद्धा परंपरा (Warrior Heritage) “हर एक घुसपैठिये को चुन-चुन कर बाहर निकालेंगे”: सीमांचल दौरे पर अमित शाह का बड़ा एलान, बंगाल चुनाव से पहले बढ़ी सियासी तपिश