नई दिल्ली: नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) द्वारा जारी कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान (Social Science) की नई किताब एक बड़े विवाद के केंद्र में आ गई है। इस किताब में न्यायपालिका के भीतर “भ्रष्टाचार” और “केसों के भारी बोझ” जैसे मुद्दों को शामिल किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने इसे संस्था की छवि बिगाड़ने की एक “गहरी साज़िश” करार देते हुए किताब के प्रकाशन और वितरण पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। विवाद की मुख्य बातें (10 पॉइंट्स में): विवादास्पद चैप्टर: विवाद की जड़ कक्षा 8 की नई पाठ्यपुस्तक का अध्याय ‘The Role of the Judiciary in Our Society’ (हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका) है, जिसे 24 फरवरी को जारी किया गया था। आपत्तिजनक अंश: इस चैप्टर में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, लंबित मुकदमों की भारी संख्या और जजों की कमी जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया था, जिसे 13-14 साल के बच्चों के लिए अनुपयुक्त माना गया। सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई: वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल द्वारा मामला ध्यान में लाए जाने के बाद, जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए सुनवाई शुरू की। संस्था की गरिमा: चीफ जस्टिस ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट किसी को भी न्यायपालिका जैसी संस्था को “बदनाम” करने की अनुमति नहीं देगा। किताब पर पूर्ण प्रतिबंध: कोर्ट ने आदेश दिया है कि देश के किसी भी स्कूल या रिटेल दुकान में मौजूद इस किताब की प्रतियों (हार्ड कॉपी और सॉफ्ट कॉपी) को तुरंत हटाया जाए और डिजिटल सर्कुलेशन पर भी रोक लगाई जाए। NCERT की माफी: विवाद बढ़ते देख NCERT ने माफी मांगी और इसे “अनजाने में हुई गलती” बताया। संस्थान ने बिकी हुई 38 प्रतियों को वापस लेने और चैप्टर को दोबारा लिखने की बात कही है। कड़ी जांच के आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल सिलेबस बोर्ड के उन सदस्यों के नाम मांगे हैं जिन्होंने यह चैप्टर लिखा है। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “हम इसकी गहराई से जांच करेंगे… इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर गाज गिरेगी।” अवमानना का नोटिस: कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव और NCERT के निदेशक डॉ. दिनेश प्रसाद सकलानी को ‘अदालत की अवमानना’ (Contempt of Court) का नोटिस जारी किया है। सरकार का रुख: केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से माफी मांगी और आश्वासन दिया कि संबंधित अधिकारियों को भविष्य में किसी भी सरकारी पैनल में शामिल नहीं किया जाएगा। जानबूझकर किया गया कृत्य?: वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि केवल न्यायपालिका को भ्रष्टाचार के लिए चुनना एक “सोची-समझी रणनीति” लग रही है, जबकि अन्य क्षेत्रों पर चुप्पी साधी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह कार्रवाई वैध आलोचना को रोकने के लिए नहीं, बल्कि संस्थागत अधिकार और गरिमा को कम करने के प्रयासों के खिलाफ है। मामले की अगली सुनवाई अब चार सप्ताह बाद होगी। FacebookShare on XLinkedInWhatsAppEmailCopy Link Post navigation पलक तिवारी का नवाबी लुक—अनारकली और झूमर ईयररिंग्स में छाया देसी स्टाइल स्कूल में 9 साल की बच्ची को हार्ट अटैक, चार माह पहले भाई की भी हुई थी मौत